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17 साल का इंतज़ार खत्म ब्रिगेडियर बनेंगे कर्नल श्रीकांत पुरोहित, सेना ने दी प्रमोशन को मंजूरी

By: डिजिटल डेस्क

On: Friday, April 10, 2026 2:11 PM

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नई दिल्ली: 2008 के मालेगांव धमाकों के मामले में लंबे समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित के लिए एक बड़ी खुशखबरी सामने आई है। भारतीय सेना ने उन्हें ब्रिगेडियर के पद पर पदोन्नत (Promote) करने की मंजूरी दे दी है। यह फैसला सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) के उस निर्देश के बाद आया है, जिसमें उनकी सेवानिवृत्ति पर रोक लगा दी गई थी।

कानूनी लड़ाई और सम्मान की वापसी

कर्नल पुरोहित का करियर 2008 में उनकी गिरफ्तारी के बाद से लगभग थम गया था। उन पर मालेगांव ब्लास्ट में शामिल होने के गंभीर आरोप थे, जिसके कारण उन्हें वर्षों तक जेल में रहना पड़ा। हालांकि, 31 जुलाई 2025 को मुंबई की विशेष एनआईए (NIA) कोर्ट ने उन्हें और साध्वी प्रज्ञा ठाकुर समेत छह अन्य आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। कोर्ट ने माना था कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ ठोस सबूत पेश करने में विफल रहा।

पुरोहित के करियर का घटनाक्रम:

  • 2008: मालेगांव ब्लास्ट मामले में गिरफ्तारी और निलंबन।
  • 2017: सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने के बाद सेना में वापसी।
  • सितंबर 2025: निर्दोष साबित होने के बाद पूर्ण कर्नल (Full Colonel) के रूप में पदोन्नति।
  • अप्रैल 2026: सेना द्वारा ब्रिगेडियर रैंक के लिए मंजूरी।

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सेना न्यायाधिकरण (AFT) का हस्तक्षेप

कर्नल पुरोहित 31 मार्च 2026 को सेवानिवृत्त (Retire) होने वाले थे। उन्होंने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण में याचिका दायर कर तर्क दिया कि उनके साथ के अधिकारी अब उनसे वरिष्ठ पदों पर हैं और केवल लंबे समय तक चले ट्रायल के कारण उनकी पदोन्नति रुकी रही। न्यायाधिकरण ने 16 मार्च 2026 को उनकी सेवानिवृत्ति पर रोक लगा दी और रक्षा मंत्रालय को उनकी पदोन्नति पर विचार करने का निर्देश दिया।

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मालेगांव मामला एक नज़र में

29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल में हुए धमाके में 6 लोगों की मौत हुई थी और 95 घायल हुए थे। करीब 17 साल तक चली जांच और सुनवाई के बाद, अदालत ने सभी मुख्य आरोपियों को गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और अन्य आरोपों से मुक्त कर दिया।

कर्नल पुरोहित की ब्रिगेडियर के रूप में पदोन्नति न केवल उनके व्यक्तिगत करियर की जीत है, बल्कि इसे न्यायपालिका और सेना के बीच समन्वय के एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।

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