सीधी जिला न्यायालय ने छह साल पुराने एक सड़क हादसे में बस चालक बुद्धिमान प्रसाद यादव को सभी आरोपों से बरी कर दिया। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी मृदुल लटौरिया ने साक्ष्यों के अभाव और गवाह बयानों के विरोधाभास को आधार बनाया। यह फैसला न केवल आरोपी को राहत देता, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की मजबूती भी दर्शाता। सिंगरौली निवासी 31 वर्षीय चालक के खिलाफ दंड संहिता की धारा 279 व 337 में केस चल रहा था।
दोपहर का काला अध्याय
19 नवंबर 2018 को गोरियरा मेन रोड पर दोपहर 2 से 3 बजे के बीच बस क्रमांक MP-17-P-0433 अनियंत्रित हो गई। दुर्गा प्रजापति, रघुवीर व बेलसुआ को चोटें आईं। कोतवाली थाने में उसी दिन रिपोर्ट दर्ज हुई। अभियोजन ने चालक पर तेज रफ्तार व लापरवाही का आरोप लगाया। लेकिन कोर्ट में साक्ष्य कमजोर साबित हुए। यह मामला सड़क सुरक्षा के दावों को चुनौती देता।
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गवाहों की कसौटी पर फेल
अभियोजन के गवाह बयानों में भारी विसंगतियां। रघुवीर ने प्रतिपरीक्षण में माना कि वह बस के अंदर था, चालक को वाहन चलाते नहीं देखा। बेलसुआ के कथन में समय व तरीके पर मतभेद। कोर्ट ने नोटिस लिया कि बस के चालक की पहचान सिद्ध नहीं। न तो गति का प्रमाण, न लापरवाही का पुख्ता सबूत। केवल टक्कर से अपराध सिद्ध नहीं होता।
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कानूनी दायरे की सीमा
न्यायालय ने स्पष्ट कहा दंड प्रकरण में अभियोजन को संदेह से परे साबित करना होता। यहाँ साक्ष्य अपर्याप्त। इसलिए बुद्धिमान प्रसाद को धारा 279 (लापरवाही से वाहन) व 337 (शरीर को नुकसान) से मुक्त। जमानत बंध पत्र भी रद्द। यह फैसला साबित करता कि कानून भावना से ऊपर। सड़क हादसों में साक्ष्य महत्वपूर्ण।







