दिल्ली उच्च न्यायालय ने आज एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए डिजिटल विज्ञापन की दुनिया में जवाबदेही तय करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। कोर्ट ने केंद्र सरकार और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय को कड़े निर्देश दिए हैं कि सोशल मीडिया ‘इन्फ्लुएंसर्स’ द्वारा किए जाने वाले भ्रामक विज्ञापनों (Misleading Ads) पर लगाम लगाने के लिए एक मजबूत और सख्त कानूनी ढांचा तैयार किया जाए। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर गलत जानकारी देकर मासूम उपभोक्ताओं को गुमराह करना उनके मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
जवाबदेही तय करना समय की मांग
न्यायमूर्ति की पीठ ने सुनवाई के दौरान चिंता व्यक्त की कि वर्तमान में इन्फ्लुएंसर्स बिना किसी वैज्ञानिक आधार या सत्यापन के स्वास्थ्य, सौंदर्य और वित्तीय निवेश से जुड़े उत्पादों का प्रचार कर रहे हैं। कोर्ट ने टिप्पणी की कि इन्फ्लुएंसर्स की पहुंच लाखों लोगों तक होती है, और उनके द्वारा किए गए एक गलत दावे का समाज पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए, यह आवश्यक है कि विज्ञापनदाता और प्रचारक दोनों की जिम्मेदारी तय की जाए।
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उपभोक्ता मंत्रालय की मौजूदा गाइडलाइंस और चुनौतियां
हालांकि, उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने पहले ही ‘एंडोर्समेंट नो-हाउ!’ (Endorsements Know-how!) नामक दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनमें इन्फ्लुएंसर्स के लिए यह अनिवार्य किया गया है कि वे किसी भी सशुल्क प्रचार (Paid Promotion) के बारे में साफ-साफ जानकारी दें। इसके बावजूद, कोर्ट ने पाया कि इन नियमों का जमीनी स्तर पर पालन नहीं हो रहा है।
- जुर्माने का प्रावधान: मौजूदा नियमों के तहत भ्रामक विज्ञापन देने पर इन्फ्लुएंसर्स पर ₹10 लाख तक का जुर्माना और दोहराने पर ₹50 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
- प्रतिबंध: गंभीर मामलों में भ्रामक प्रचार करने वाले व्यक्ति को 1 से 3 साल तक के लिए विज्ञापन करने से प्रतिबंधित भी किया जा सकता है।
कोर्ट ने क्या दिए निर्देश?
अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि वे ऐसी व्यवस्था बनाएं जिससे विज्ञापनों की सत्यता की जांच त्वरित रूप से हो सके। कोर्ट ने सुझाव दिया कि इन्फ्लुएंसर्स को उन उत्पादों की गुणवत्ता के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए जिनका वे प्रचार करते हैं, खासकर यदि वे उत्पाद स्वास्थ्य या वित्तीय सुरक्षा से जुड़े हों।
भविष्य की राह और प्रभाव
इस आदेश के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि केंद्र सरकार जल्द ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए एक नई नियमावली पेश करेगी। इससे न केवल उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा होगी, बल्कि डिजिटल मार्केटिंग के क्षेत्र में पारदर्शिता भी आएगी। अब इन्फ्लुएंसर्स को किसी भी ब्रांड के साथ जुड़ने से पहले उस उत्पाद की विश्वसनीयता की स्वयं जांच करनी होगी, अन्यथा उन्हें भारी कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।







