भारत में स्ट्रीट फूड सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि संघर्ष और सपनों की कहानी भी होता है। ऐसी ही एक कहानी इन दिनों सोशल मीडिया और शहर की गलियों में चर्चा का विषय बनी हुई है एक ऐसा शख्स, जो कभी दो रुपये के दही-भल्ले बेचकर दिन गुजारा करता था, और आज उसी दुकान पर लाखों की लग्ज़री गाड़ी से आता है। किस्मत का यह 360 डिग्री का पलटना किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं, लेकिन यह पूरी तरह हकीकत है।
दो रुपये से शुरू हुआ सफर
करीब 15 साल पहले, उत्तर भारत के एक छोटे से शहर में रहने वाले राकेश वर्मा (नाम बदला हुआ लेकिन परिस्थितियां वास्तविक) रोज़ सुबह तड़के उठकर दही जमाते थे। जेब में पूंजी के नाम पर बस कुछ बर्तन और मां के हाथों का सिखाया हुआ स्वाद था। उस समय एक प्लेट दही-भल्ले की कीमत सिर्फ दो रुपये रखी गई, ताकि मजदूर, छात्र और आम लोग भी पेट भर सकें। मुनाफा बेहद कम था, लेकिन ग्राहकों का भरोसा धीरे-धीरे बनता गया।
स्वाद बना सबसे बड़ा ब्रांड
राकेश की खासियत थी क्वालिटी से कभी समझौता नहीं। महंगाई बढ़ी, दाम बढ़े, लेकिन दही की ताजगी और चटनी का स्वाद वही रहा। यही कारण था कि उनकी दुकान “फलां दही-भल्ले वाले” के नाम से मशहूर हो गई। आसपास के इलाकों से लोग खासतौर पर उनके स्टॉल पर आने लगे। सोशल मीडिया आने के बाद फूड ब्लॉगर्स ने भी उनके स्टॉल को कवर किया, जिससे पहचान और तेजी से बढ़ी।
मेहनत, मैनेजमेंट और माइंडसेट
किस्मत ने सिर्फ पलटी नहीं मारी, बल्कि राकेश ने खुद उसे मोड़ा। उन्होंने कमाई का बड़ा हिस्सा वापस बिज़नेस में लगाया बेहतर काउंटर, साफ-सफाई, स्टाफ ट्रेनिंग और एक छोटा सेंट्रल किचन। यहीं से उनका काम सिर्फ ठेला नहीं, बल्कि एक मिनी फूड ब्रांड बन गया। आज शहर में उनकी तीन आउटलेट्स हैं और रोज़ सैकड़ों प्लेट दही-भल्ले बिकते हैं।







