नई दिल्ली | 13 अप्रैल, 2026 राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को सुप्रीम कोर्ट से आज एक बड़ा कानूनी झटका लगा है। देश की सर्वोच्च अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज एक एफआईआर (FIR) को रद्द करने की मांग वाली उनकी याचिका को खारिज कर दिया है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब बिहार और देश की राजनीति गर्माई हुई है, और यह लालू यादव की कानूनी लड़ाइयों को और पेचीदा बना सकता है।
मामला क्या है?
यह मामला विशेष रूप से एक विशिष्ट भ्रष्टाचार के आरोप से जुड़ा है, जिसके आधार पर केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने एक नई प्राथमिकी (FIR) दर्ज की थी। लालू यादव के कानूनी दल ने इस आधार पर FIR को रद्द करने की मांग की थी कि यह “राजनीतिक प्रतिशोध” से प्रेरित है और एक ही मामले में बार-बार जाँच की जा रही है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस सुधीर कुमार और जस्टिस अनीता देसाई शामिल थे, ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
मध्यप्रदेश में लू का अलर्ट 16 अप्रैल से ‘लू’ का अलर्ट, जानें अपने शहर का हाल
अदालत ने कहा कि जाँच के इस चरण में FIR को रद्द करना उचित नहीं है, खासकर जब केंद्रीय एजेंसी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए सबूत पेश किए हैं।
CBI की चार्जशीट और आरोपों की गंभीरता
CBI पहले ही इस मामले में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल कर चुकी है। एजेंसी का दावा है कि उनके पास लालू यादव की कथित संलिप्तता के “पुख्ता और निर्णायक” सबूत हैं। चार्जशीट दाखिल होने का मतलब है कि जाँच एजेंसी के पास प्रारंभिक रूप से मामला चलाने के लिए पर्याप्त सामग्री है। अब, FIR रद्द करने की याचिका खारिज होने के बाद, संबंधित निचली अदालत में मुकदमा चलाने का रास्ता पूरी तरह साफ हो गया है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी“शाइलॉक की तरह मांस नोचना चाहती है अमीर पत्नी”
आंकड़े और कानूनी स्थिति
लालू प्रसाद यादव पहले ही चारा घोटाले के चार अलग-अलग मामलों में सजायाफ्ता हैं और वर्तमान में स्वास्थ्य आधार पर जमानत पर बाहर हैं। उन्हें चारा घोटाले के देवघर, दुमका, डोरंडा और चाईबासा कोषागार मामलों में कुल मिलाकर 14 साल से अधिक की सजा सुनाई गई थी, जिसमें से वह आधी से अधिक सजा काट चुके हैं।
आज की सुप्रीम कोर्ट की अस्वीकृति ने एक नए मामले में उनकी कानूनी मुसीबतें बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस नए मामले में आरोप पत्र के आधार पर ट्रायल कोर्ट जल्द ही आरोप तय (Charges framed) कर सकती है, जिससे लालू यादव को बार-बार अदालत के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं और यह उनकी राजनीतिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। आरजेडी ने इस फैसले को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया है, जबकि सीबीआई ने इसे अपनी जाँच की “सत्यता की जीत” कहा है।







