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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी“शाइलॉक की तरह मांस नोचना चाहती है अमीर पत्नी”

By: डिजिटल डेस्क

On: Monday, April 13, 2026 1:05 PM

MP High Court Maintenance Ruling
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जबलपुर: Madhya Pradesh High Court ने गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) से जुड़े एक अहम मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि आर्थिक रूप से सक्षम पत्नी द्वारा पति से मेंटेनेंस मांगना कानून के उद्देश्य के विपरीत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि कोई महिला स्वयं हर महीने ₹1 लाख से अधिक कमा रही है, तो उसका अलग रह रहे पति से भरण-पोषण की मांग करना “मर्चेंट ऑफ वेनिस के शाइलॉक की तरह मांस नोचने” जैसा प्रतीत होता है।

शेक्सपियर के नाटक का हवाला

मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस G.S. Ahluwalia ने महान साहित्यकार William Shakespeare के प्रसिद्ध नाटक The Merchant of Venice का उल्लेख किया। अदालत ने पत्नी की तुलना नाटक के पात्र Shylock से की, जो अपने कर्ज की वसूली के लिए शरीर से एक पाउंड मांस काटने पर अड़ा रहता है।कोर्ट ने कहा कि जब पत्नी खुद आर्थिक रूप से मजबूत है, तो पति से मेंटेनेंस मांगना न्यायसंगत नहीं बल्कि प्रताड़ना जैसा है।

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क्या है मामला?

यह मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है, जिसमें पत्नी ने निचली अदालत द्वारा उसकी मेंटेनेंस याचिका खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।

  • पत्नी की आय: सुनवाई में सामने आया कि महिला एक प्रतिष्ठित संस्थान में कार्यरत है और उसकी मासिक आय ₹1 लाख से अधिक है।
  • पति की स्थिति: पति की सीमित आय और अन्य जिम्मेदारियों को देखते हुए कोर्ट ने पाया कि पत्नी को मेंटेनेंस की आवश्यकता नहीं है।
  • कानूनी प्रावधान: Section 125 CrPC के तहत मेंटेनेंस का उद्देश्य केवल आर्थिक रूप से निर्भर व्यक्ति को सहायता देना है।

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अदालत की सख्त टिप्पणी

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि मेंटेनेंस कानून महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए है, न कि इसे “उगाही का माध्यम” बनाया जाए।

“कानून का इस्तेमाल किसी को आर्थिक रूप से कमजोर करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। जब पत्नी आत्मनिर्भर है, तो पति पर अनावश्यक बोझ डालना उचित नहीं है।”

फैसले का असर और बहस

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है, जहां दोनों पक्ष आर्थिक रूप से सक्षम हैं।इस निर्णय के बाद यह बहस तेज हो गई है कि क्या भारत में मेंटेनेंस कानूनों को अधिक व्यावहारिक और “जेंडर न्यूट्रल” बनाया जाना चाहिए।फिलहाल, यह स्पष्ट संकेत है कि अदालतें अब मेंटेनेंस मामलों में केवल रिश्ते के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक आर्थिक स्थिति को प्राथमिकता दे रही हैं।

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