सिंगरौली कलेक्ट्रेट में मंगलवार को आयोजित जनसुनवाई एक बार फिर जिले की प्रशासनिक सक्रियता और जनता की उम्मीदों का केंद्र बनी। युवा कलेक्टर श्री गौरव बैनल के समक्ष जिले के सुदूर अंचलों से आए 265 आवेदकों ने अपनी व्यथा सुनाई। हालांकि, कलेक्टर ने कई मामलों का मौके पर ही निराकरण करने के निर्देश दिए, लेकिन जानकारों का मानना है कि इन निर्देशों का ‘कठोर पालन प्रतिवेदन’ (Compliance Report) ही इस पूरी कवायद की सार्थकता तय करेगा।
प्रमुख मामले संबल योजना से लेकर आवास तक की गुहार
जनसुनवाई में सामाजिक सुरक्षा और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े आवेदनों की भरमार रही। चिनगी टोला निवासी आनंद लाल बैगा ने अपनी मृतक पत्नी (संबल कार्डधारी) की अनुग्रह राशि के लिए आवेदन दिया। वहीं, ग्राम पंचायत चाचर के आदिवासियों ने बस्ती में नवीन हैंडपम्प खनन की मांग की, जो जिले में गहराते जल संकट की ओर इशारा करता है।
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दिव्यांगों की सहायता के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए, चितरंगी के मोहम्मद नाईम को ट्राईसिकिल दिलाने हेतु त्वरित कार्रवाई के निर्देश दिए गए। इसके अलावा, किसान सम्मान निधि, बीपीएल सूची में नाम जोड़ने और प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत बकाया राशि के भुगतान जैसे गंभीर मुद्दे भी कलेक्टर के सामने आए।
प्रशासनिक अमले की मौजूदगी और सख्त निर्देश
जनसुनवाई के दौरान संयुक्त कलेक्टर संजीव पाण्डेय, नगर निगम आयुक्त सविता प्रधान और अन्य आला अधिकारी मौजूद रहे। कलेक्टर बैनल ने स्पष्ट किया कि जिन आवेदनों का मौके पर निराकरण संभव नहीं है, उन्हें संबंधित विभागों को समय-सीमा (Time-limit) के भीतर समाधान करने के लिए भेजा जाए।
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विश्लेषण ‘निराकरण’ बनाम ‘वास्तविक समाधान’
सिंगरौली जैसे औद्योगिक और जनजातीय बाहुल्य जिले में जनसुनवाई केवल एक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि प्रशासन की जवाबदेही की कसौटी है। सांख्यिकीय दृष्टि से देखें तो:
- कुल आवेदन: 265
- प्रमुख मुद्दे: राजस्व (सीमांकन/नक्शा तरमीम), पेयजल और सामाजिक कल्याण योजनाएं।
- चुनौती: अक्सर देखा गया है कि फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग में घूमती रहती हैं।
बड़ा सवाल
केवल आवेदन लेना और उन्हें फॉरवर्ड करना पर्याप्त नहीं है। सिंगरौली की जनता को अब उस ‘कठोर पालन प्रतिवेदन’ का इंतजार है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि चिनगी टोला की पियासी यादव को उनका मकान मिला या इन्द्रमणि जयसवाल के गांव में बिजली पहुँची या नहीं।
युवा नेतृत्व में प्रशासन ऊर्जावान तो दिख रहा है, लेकिन मैदानी स्तर के अधिकारियों को ‘निर्धारित समय-सीमा’ के प्रति अधिक उत्तरदायी होना पड़ेगा। यदि इन 265 आवेदनों का समाधान समय पर नहीं हुआ, तो आगामी जनसुनवाई में भीड़ तो बढ़ेगी, लेकिन प्रशासन पर विश्वास कम हो सकता है।






