होम Best Offer लाइफस्टाइल नेशनल न्यूज मध्य प्रदेश लोकल न्यूज टेक्नोलॉजी बिजनेस अन्य

सिंगरौली कोर्ट का बड़ा फैसला गवाह पलटे, आरोपियों को बरी

By: डिजिटल डेस्क

On: Saturday, April 4, 2026 3:24 PM

how a case collapses when witnesses turn hostile in court
Google News
Follow Us
---Advertisement---

सिंगरौली जिले के वैढन स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय ने एक अहम आपराधिक मामले में ऐसा फैसला सुनाया, जिसने अभियोजन की पूरी नींव को सवालों के घेरे में ला खड़ा किया। राजकुमार गुप्ता और उनके पुत्र शिवांश गुप्ता के खिलाफ दर्ज दांडिक प्रकरण में अदालत ने सभी आरोपों से उन्हें दोषमुक्त कर दिया। यह निर्णय न केवल कानूनी प्रक्रिया की जटिलता को दर्शाता है, बल्कि गवाहों की भूमिका की निर्णायक अहमियत भी उजागर करता है।

घटनाक्रम: FIR से फैसले तक

यह मामला 1 नवंबर 2025 को थाना वैढन में दर्ज हुआ था, जब गल्ला मंडी में कथित विवाद और मारपीट की घटना सामने आई। पुलिस ने तेजी दिखाते हुए 18 नवंबर को चार्जशीट पेश कर दी। लेकिन सुनवाई के दौरान 23 मार्च 2026 को जब साक्ष्य दर्ज हुए, तो कहानी ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। उसी दिन आरोप तय हुए और फैसला भी सुना दिया गया।

जनगणना 2027: डिजिटल क्रांति की शुरुआत, ओम बिरला ने दिखाया रास्ता

 अदालत में बदल गए बयान

इस केस की धुरी रहे फरियादी विनोद कुमार गुप्ता ने अदालत में अपने ही आरोपों से किनारा कर लिया। जहां FIR में उन्होंने गाली-गलौज और मारपीट का आरोप लगाया था, वहीं कोर्ट में उन्होंने इसे “मामूली विवाद” बताया। उन्होंने यहां तक कहा कि पुलिस ने उनका बयान ठीक से दर्ज ही नहीं किया। इस एक बयान ने पूरे अभियोजन को कमजोर कर दिया।

chikankari-bridflower-tshirt-summer-patterns-india-चिकनकारी ब्रिदफ्लावर टी-शर्ट गर्मी के टॉप 5 पैटर्न

अभियोजन की सबसे बड़ी चूक

अभियोजन पक्ष मुख्य गवाह को “होस्टाइल” होने से रोकने में विफल रहा। न तो स्वतंत्र गवाहों के बयान पर्याप्त रूप से जुटाए गए और न ही सार्वजनिक स्थान पर अश्लील भाषा के इस्तेमाल (धारा 296 BNS) को साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। परिणामस्वरूप, अदालत के सामने आरोपों को टिकाए रखना संभव नहीं रहा।

पुलिस जांच पर उठे सवाल

जांच के दौरान घटनास्थल का नक्शा तैयार किया गया, लेकिन राहगीरों या स्वतंत्र गवाहों के बयान नहीं लिए गए। इससे केस की विश्वसनीयता पर असर पड़ा। फरियादी का यह आरोप कि उसका बयान ही नहीं लिया गया, जांच प्रक्रिया की गंभीर खामी को दर्शाता है।

 वकीलों की रणनीति ने बदली तस्वीर

बचाव पक्ष के अधिवक्ता राकेश चतुर्वेदी ने गवाहों के पलटने को अपनी रणनीति का केंद्र बनाया, जबकि अभियोजन पक्ष के ए.डी.पी.ओ. कौशलेश पटेल इस स्थिति को संभालने में सफल नहीं हो सके। अदालत में साक्ष्य और तर्कों की यह लड़ाई अंततः बचाव पक्ष के पक्ष में झुक गई।

न्यायालय का स्पष्ट संदेश

पीठासीन अधिकारी शिवचरण पटेल ने अपने फैसले में साफ कहा कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोप सिद्ध नहीं होते। खासकर धारा 296 के तहत कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला। नतीजतन, आरोपियों को बरी कर उनके जमानत मुचलके भी समाप्त कर दिए गए।

 न्याय व्यवस्था का आईना

यह मामला बताता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में गवाहों की भूमिका कितनी निर्णायक होती है। यदि गवाह अपने बयान से मुकर जाएं और साक्ष्य कमजोर हों, तो गंभीर आरोप भी अदालत में टिक नहीं पाते। यह फैसला पुलिस जांच और अभियोजन की तैयारी दोनों के लिए एक सीख के रूप में सामने आया है।

For Feedback - Feedback@shopingwoping.com.com

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now
Slide Up
x