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सिंगरौली कोर्ट का फैसला 56 लीटर अवैध शराब केस में पुलिस जांच पर सवाल, झूठे केस में आरोपी बरी

By: डिजिटल डेस्क

On: Saturday, April 4, 2026 3:46 PM

Singrauli illegal liquor case acquittal detailed analysis
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मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के वैढन न्यायालय ने करीब एक दशक पुराने आबकारी मामले में ऐसा फैसला सुनाया, जिसने पुलिस विवेचना की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शिवचरण पटेल ने वर्ष 2015 के इस मामले में आरोपी विष्णु प्रसाद हरिजन को दोषमुक्त करते हुए कहा कि “संदेह के लाभ” की स्थिति स्पष्ट रूप से मौजूद है।

रेड और बरामदगी का दावा

मामला 28 जुलाई 2015 का है, जब विंध्यनगर थाना पुलिस ने नवजीवन विहार क्षेत्र में छापा मारकर 56 लीटर अवैध महुआ शराब बरामद करने का दावा किया था। पुलिस के मुताबिक, यह कार्रवाई मुखबिर की सूचना पर की गई थी। शुरुआती दस्तावेज़ों में कार्रवाई सख्त और सुनियोजित दिखाई गई, लेकिन अदालत में यही कहानी बिखरती नजर आई।

सिंगरौली कोर्ट का बड़ा फैसला गवाह पलटे, आरोपियों को बरी

 अदालत में कमजोर पड़ती कहानी

सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य न केवल अधूरे थे, बल्कि कई स्तरों पर विरोधाभासी भी थे। अदालत में पेश किए गए जप्त डिब्बे न तो सीलबंद थे और न ही उन पर गवाहों के हस्ताक्षर मौजूद थे। इससे यह संदेह उत्पन्न हुआ कि क्या वास्तव में वही सामग्री अदालत में पेश की गई, जो मौके से जब्त की गई थी।

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 ‘चेन ऑफ कस्टडी’ पर सबसे बड़ा सवाल

इस केस की सबसे गंभीर कमजोरी “चेन ऑफ कस्टडी” यानी जप्त सामग्री की सुरक्षित और प्रमाणिक श्रृंखला में टूटन रही। विवेचक द्वारा खुद यह स्वीकार करना कि मौके पर शराब को सीलबंद नहीं किया गया, अभियोजन के लिए घातक साबित हुआ। अदालत ने इसे साक्ष्य की विश्वसनीयता पर सीधा आघात माना।

 स्वतंत्र गवाहों का मुकरना

मामले के स्वतंत्र गवाह मायाराम साकेत और उमेश साकेत ने अदालत में पुलिस की कार्यवाही से ही इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें दस्तावेज पढ़कर नहीं सुनाए गए और केवल हस्ताक्षर करवा लिए गए थे। इस बयान ने पुलिस की पूरी कार्रवाई को संदेह के घेरे में ला दिया।

 जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां

विवेचना के दौरान जप्तीकर्ता, गिरफ्तारीकर्ता और जांच अधिकारी एक ही व्यक्ति होना भी न्यायालय की नजर में प्रक्रिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न बन गया। साथ ही, शराब की मात्रा और मूल्य का आकलन केवल अनुमान पर आधारित पाया गया जिससे केस की तकनीकी मजबूती और कमजोर हो गई।

 वैज्ञानिक जांच का अभाव

अदालत में यह भी सामने आया कि जप्त कथित शराब की कोई रासायनिक जांच नहीं कराई गई। यानी यह साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं था कि बरामद तरल वास्तव में शराब ही था। यह चूक अभियोजन के लिए निर्णायक साबित हुई।

 न्यायालय का स्पष्ट संदेश

न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि जब साक्ष्य की श्रृंखला संदिग्ध हो और गवाह विश्वसनीय न हों, तो दोषसिद्धि संभव नहीं है। इसी आधार पर आरोपी को बरी करते हुए जप्त शराब को नष्ट करने का आदेश दिया गया।

 सिस्टम के लिए सबक

यह मामला केवल एक आरोपी की बरी होने की कहानी नहीं, बल्कि पुलिस तंत्र के लिए एक चेतावनी है। न्यायालय ने स्पष्ट संकेत दिया कि प्रक्रिया की शुद्धता और साक्ष्य की विश्वसनीयता ही न्याय की नींव है। जल्दबाजी या लापरवाही में की गई कार्रवाई अदालत की कसौटी पर टिक नहीं पाती और अंततः न्याय का पलड़ा आरोपी के पक्ष में झुक जाता है।

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