जबलपुर-मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर पीठ ने हाल ही में एक ऐसा आदेश जारी किया है जो भारत की अभी तक की कानूनी सोच को चुनौती देते हुए भी उसी की बाध्यताओं को दोहरा रहा है। न्यायाधीश जी.एस. अहलूवालिया की अदालत ने स्पष्ट किया कि वर्तमान भारतीय काराधिकार दंड संहिता (IPC) में रेप की विस्तृत परिभाषा के तहत भी पति‑पत्नी के बीच यौन संबंध को विशेष अपवाद की श्रेणी में रखा गया है। इस अपवाद के कारण अगर स्त्री अपने पति के खिलाफ अमान्य या असहज यौन कृत्यों की शिकायत करे, तो उसे अपराध के तौर पर ‘रेप’ नहीं, बल्कि विवाहित जीवन की एक असहनीय क्रूरता के रूप में देखा जाता है।
मामले की मूल झाँकी जहाँ ‘अनैस्ट्रल सेक्स’ क्रिया बनी कानून का मोड़दार प्रश्न
माननीय अदालत के सामने पहुँचा मामला ग्वालियर के जिला Gwalior के थाना सीरोल में दर्ज FIR का था, जिसमें पीड़िता ने अपने पति पर नियमित रूप से मादक पदार्थ के सेवन के बाद अनैस्ट्रल (गैर‑पारंपरिक) यौन कृत्यों से जबरन जुड़ाव और विरोध करने पर मारपीट व उत्पीड़न की शिकायत की थी। उसका आरोप था कि जब भी वह इस तरह की “गलत हरकतों” से इनकार करती तो पति उसे पीटता, डांटता और भावनात्मक रूप से तोड़ने का प्रयास करता। इसी FIR के आधार पर अभियुक्त पर IPC की धारा 377 (अनैस्ट्रल यौन कृत्य), 323 (सरल आघात) तथा 498A (पत्नी को उत्पीड़न) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
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कानूनी जाल में भटकती रेप की परिभाषा
अदालत ने इस मामले में फैसला लेते हुए धारा 375 (रेप की परिभाषा) में वर्णित द्वितीय अपवाद (Exception 2) पर विशेष ज़ोर दिया। इस अपवाद के अनुसार, यदि स्त्री 15 वर्ष से अधिक आयु की है, तो पति के द्वारा अपनी ही पत्नी के साथ यौन संबंध स्थापित होने पर वह कानूनी रूप से रेप की श्रेणी में नहीं आता। चाहे वह संबंध ‘सामान्य’ हो या अब विस्तृत रेप परिभाषा में शामिल ‘गुदा’, ‘मूत्रमार्ग’ या ‘मुँह’ के माध्यम से हो, अपवाद लागू होते ही पत्नी की सहमति या असहमति कानूनी दृष्टि से निरर्थक हो जाती है। इसी तर्क के आधार पर अदालत ने धारा 376 और 377 के तहत रेप के आरोपों को खारिज कर दिया, क्योंकि IPC में अभी तक वैवाहिक बलात्कार (marital rape) को अपराध नहीं माना गया है।
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लेकिन ‘क्रूरता’ का दरवाजा खुला रहा
यहाँ अदालत ने एक महत्वपूर्ण सीमा खींची: यद्यपि पति‑पत्नी के बीच बलपूर्वक गैर‑पारंपरिक यौन कृत्य को रेप के रूप में नहीं पकड़ा जा सकता, तथापि ऐसे व्यवहार को धारा 498A के तहत “क्रूरता” (cruelty) के रूप में देखा जा सकता है। अदालत ने धारा 498A की व्याख्या करते हुए कहा कि “जब पत्नी विरोध करती है और उसके विरोध के बावजूद पति उसे अनैस्ट्रल यौन क्रिया के लिए बाध्य करता है, साथ ही उस पर मारपीट और शारीरिक उत्पीड़न करता है, तो यह स्थिति स्पष्ट रूप से धारा 498A के तहत ‘क्रूर व्यवहार’ के अंतर्गत आती है।” इस तर्क के आधार पर FIR में धारा 377 से संबंधित रेप के आरोप खत्म हुए, लेकिन धारा 498A और 323 के तहत मामला जारी रखने की अनुमति दी गई।
सहमति बनाम विवाहिक बंधन
इस आदेश में न्यायाधीश ने आधुनिक कानूनी दर्शन और संवैधानिक मूल्यों के बीच एक संवेदनशील तनाव दिखाया है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक विवाह के बंधन में रहते हुए स्त्री 18 वर्ष से अधिक आयु की हो, तब तक उसकी सहमति के बारे में विवाद उत्पन्न होने पर भी वैवाहिक यौन क्रिया को रेप नहीं माना जा सकता। यह निर्णय उसी तर्क को ले जाता है जो वर्ष 2017 के Independent Thought v. Union of India में सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, जहाँ धारा 375 के द्वितीय अपवाद को 18 वर्ष से कम आयु की स्त्री तक ही सीमित रखा गया था, लेकिन 18 वर्ष से ऊपर की पत्नी के संबंध में अपवाद आज भी कानूनी रूप से बरकरार है।
प्रभाव: महिलाओं के अधिकार में ऐतिहासिक अंतराल
मानवाधिकार और महिला अधिकार संगठनों के हलकों में यह फैसला एक द्वंद्व की तरह देखा जा रहा है। एक ओर यह स्वीकार करना पड़ता है कि न्यायालय ने अपनी सीमाओं के भीतर पत्नी की पीड़ा को नज़रअंदाज़ नहीं किया, बल्कि स्पष्ट रूप से यह माना कि बलपूर्वक अमानवीय यौन कृत्य, उत्पीड़न और शारीरिक आघात, ये तीनों एक साथ धारा 498A के तहत गंभीर अपराध हैं। दूसरी ओर यह भी तर्क दिया जा रहा है कि जब तक वैवाहिक बलात्कार को सीधे रेप के रूप में अपराधीकृत नहीं किया जाता, तब तक महिला की व्यक्तिगत सहमति और शरीर पर अपने अधिकार की विचारधारा के साथ विवाह के “सहमति के अधिकार” में एक गहरा अंतराल बना रहेगा।
शादी को अनुकूलता की नहीं, यौन शोषण की छत का ढाँचा नहीं
यह फैसला एक विशेष संदेश भी देता है: शादी का बंधन किसी भी प्रकार के असहज या अमानवीय यौन कृत्य के लिए कानूनी छाता नहीं बना सकता। यह अवधारणा स्पष्ट करती है कि वैवाहिक जीवन भी सहमति, सम्मान और मानवता पर टिका है; और जब तक अपराध की सीमा से ऊपर का शोषण जारी रहता है, तब तक वह अपराध के रूप में दर्ज़ रहेगा, चाहे वह रेप की श्रेणी में आए या न आए।







