चैत्र मास की इस शुभ तिथि पर, भारत की राजधानी की सुबह एक ऐसी शख्सियत के सम्मान में नत-मस्तक हुई, जिसने भारतीय लोकतंत्र की नींव में सामाजिक समरसता का सीमेंट भरा था। देश के पूर्व उप-प्रधानमंत्री और वंचितों की मुखर आवाज़ रहे बाबू जगजीवन राम की जयंती पर संसद भवन के ऐतिहासिक सेंट्रल हॉल से लेकर डिजिटल मंचों तक, श्रद्धा के सुमन अर्पित किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें याद करते हुए कहा कि “बाबूजी का जीवन अनुशासन, सेवा और समानता के प्रति अडिग संकल्प का जीवंत उदाहरण है।” लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भी उनकी दूरदर्शिता को नमन करते हुए उन्हें भारतीय संसदीय गरिमा का अटूट स्तंभ बताया।
मात्र एक पद नहीं, एक प्रखर वैचारिक क्रांति
बाबू जगजीवन राम का ज़िक्र अक्सर केवल एक ‘दलित नेता’ या ‘उप-प्रधानमंत्री’ के तौर पर सीमित कर दिया जाता है, लेकिन एक विद्वान पत्रकार की गहरी दृष्टि से देखें तो वह महज़ एक पद नहीं, बल्कि एक चलती-फिरती वैचारिक क्रांति थे। 1930 के दशक में, जब दलितों के लिए मंदिरों की सीढ़ियाँ भी वर्जित थीं, तब उन्होंने ‘अछूत’ शब्द की जड़ों पर प्रहार किया और यह सिद्ध किया कि बौद्धिक योग्यता किसी विशेष जाति की जागीर नहीं होती। भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक कैबिनेट मंत्री रहने का उनका रिकॉर्ड केवल उनकी राजनीतिक चतुरता नहीं, बल्कि उनकी अद्वितीय प्रशासनिक दक्षता का प्रमाण है।
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हरित क्रांति और 1971 की विजय नेपथ्य का महानायक
आज की पीढ़ी शायद इस ऐतिहासिक तथ्य से अनभिज्ञ है कि जब भारत भुखमरी की कगार पर खड़ा था, तब कृषि मंत्री के रूप में जगजीवन राम ने ही ‘हरित क्रांति’ की रूपरेखा को धरातल पर उतारा था। उनके कुशल प्रबंधन ने देश को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाया। इतना ही नहीं, 1971 के ऐतिहासिक युद्ध के दौरान वे देश के रक्षा मंत्री थे। भारतीय सेना की रणनीतिक सफलता और बांग्लादेश के उदय के पीछे उनके अटूट धैर्य और कूटनीतिक कौशल का बहुत बड़ा योगदान था। वे एक ऐसे रक्षा मंत्री थे जो मोर्चे पर तैनात जवानों के स्वाभिमान को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानते थे।
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लोकतंत्र के सजग प्रहरी जब व्यवस्था से टकरा गए बाबूजी
बाबूजी का व्यक्तित्व कभी भी सत्ता का अंध-अनुगामी नहीं रहा। जब देश में आपातकाल (इमरजेंसी) के काले बादलों के बीच लोकतंत्र की सांसें फूल रही थीं, तब उन्होंने सत्ता के सर्वोच्च शिखर को आईना दिखाने का साहस किया। उन्होंने ‘कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी’ के माध्यम से वह लकीर खींची, जिसने बाद में जनता पार्टी की सरकार का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी राजनीति का मूल मंत्र सत्ता हथियाना नहीं, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति (अंत्योदय) की रक्षा करना था, जिसका सपना महात्मा गांधी ने देखा था।
आज के दौर में बाबूजी की प्रासंगिकता एक नई दिशा
आज जब सामाजिक विभाजन और पहचान की संकीर्ण राजनीति अक्सर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में रहती है, बाबू जगजीवन राम के आदर्श हमें याद दिलाते हैं कि न्याय की लड़ाई नफरत के शोर से नहीं, बल्कि नीति और नियम की शक्ति से जीती जाती है। ‘समता स्थल’ पर बिखरी फूलों की महक आज भी गंभीर सवाल करती है: क्या हम वास्तव में उस भारत के निर्माण के करीब पहुँच पाए हैं, जहाँ किसी ‘जगजीवन’ को अपनी पहचान के लिए जद्दोजहद न करनी पड़े?







