नई दिल्ली -देश की सर्वोच्च अदालत ने पुलिस थानों में सीसीटीवी (CCTV) कैमरे लगाने और उनके सुचारू संचालन को लेकर चल रही देरी पर कड़ी नाराजगी जाहिर की है। सुप्रीम कोर्ट में आज हुई एक महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति की पीठ ने केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया है कि इस प्रक्रिया में आ रही सभी तकनीकी और प्रशासनिक बाधाओं को अगले दो सप्ताह के भीतर हर हाल में सुलझा लिया जाए। कोर्ट ने साफ किया है कि पुलिसिया कार्रवाई में पारदर्शिता और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए यह कदम उठाना अनिवार्य है।
केंद्र सरकार ने दिया 14 दिनों का आश्वासन
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए वकीलों ने शीर्ष अदालत को आश्वस्त किया कि वे राज्यों के साथ मिलकर डेटा स्टोरेज, कैमरों की गुणवत्ता और इंटरनेट कनेक्टिविटी जैसी समस्याओं पर काम कर रहे हैं। सरकार ने भरोसा दिलाया है कि अगले 14 दिनों के भीतर एक व्यापक समाधान तैयार कर लिया जाएगा। कोर्ट ने इस समयसीमा को रिकॉर्ड पर लेते हुए निर्देश दिया कि इसके बाद किसी भी तरह की देरी को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और सख्त कार्रवाई की जाएगी।
एमपी में मौसम का तांडव 34 जिलों में आंधी-बारिश और ओलों का अलर्ट, 60 किमी की रफ्तार से चलेंगी हवाएं
मानवाधिकारों की रक्षा और हिरासत में हिंसा पर लगाम
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2020 में ‘परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह’ मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया था कि देश के हर पुलिस थाने और जांच एजेंसियों (जैसे CBI, ED, NIA) के दफ्तरों में ऑडियो रिकॉर्डिंग के साथ सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं। कोर्ट का मानना है कि कैमरों की मौजूदगी से न केवल हिरासत में होने वाली हिंसा (Custodial Violence) पर लगाम लगेगी, बल्कि झूठे आरोपों से पुलिस बल की भी रक्षा होगी। डेटा को कम से कम 12 से 18 महीनों तक सुरक्षित रखने का भी निर्देश पहले दिया जा चुका है।
डेथ केस में 9 पुलिसकर्मियों को मौत की सजा, न्यायपालिका का कड़ा संदेश
CCTV कार्यान्वयन के ताजा आंकड़े और चुनौतियां
एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, देश के कई राज्यों में सीसीटीवी तो लगा दिए गए हैं, लेकिन उनमें से 30% से अधिक कैमरे या तो खराब हैं या उनकी रिकॉर्डिंग की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं है। कई थानों में ‘नाइट विजन’ और ‘ऑडियो’ की सुविधा न होने के कारण पारदर्शिता का उद्देश्य पूरा नहीं हो पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी ‘रखरखाव’ (Maintenance) के मुद्दे पर सख्ती दिखाई है ताकि कैमरे महज शोपीस बनकर न रह जाएं।
भविष्य की राह और कोर्ट की निगरानी
अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद मुकर्रर की है, जिसमें केंद्र को प्रगति रिपोर्ट पेश करनी होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह आदेश पूरी तरह लागू होता है, तो भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में एक क्रांतिकारी बदलाव आएगा। इससे आम नागरिक का पुलिस पर भरोसा बढ़ेगा और थानों के भीतर होने वाली हर गतिविधि का डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होगा। अब देखना यह है कि दो सप्ताह की इस डेडलाइन के भीतर सरकार कितनी तेजी से जमीनी सुधार कर पाती है।







