न्यायपालिका का एक बुनियादी सिद्धांत है कि “हजारों अपराधी भले ही छूट जाएं, लेकिन एक भी बेगुनाह को सजा नहीं होनी चाहिए।” इसी सिद्धांत की झलक सिंगरौली जिला न्यायालय के हालिया फैसले में देखने को मिली। विशेष न्यायाधीश (पॉक्सो एक्ट) श्रीमती कंचन गुप्ता की अदालत ने सामूहिक दुष्कर्म और अपहरण जैसे जघन्य अपराध के मामले में साक्ष्यों की कमी और गवाहों के बयान बदलने के कारण तीनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि: अपहरण से सामूहिक दुष्कर्म तक की कहानी
यह पूरा प्रकरण 29 जुलाई 2023 की रात शुरू हुआ था, जब थाना माड़ा क्षेत्र के नगवा गाँव से एक 16 वर्षीय किशोरी के अपहरण की सूचना मिली थी। शिकायत के अनुसार, आरोपियों ने पीड़िता का अपहरण कर खैराही के जंगल में उसके साथ सामूहिक दुष्कर्म किया था। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए 01 अगस्त 2023 को FIR दर्ज की और 27 सितंबर 2023 को आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश की। आरोपियों पर भादंसं की धारा 376(डी) और पॉक्सो एक्ट की गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा चला।
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जांच में कमियां: जब ‘विज्ञान’ और ‘मेडिकल’ ने नहीं दिया साथ
एक पेशेवर पत्रकारिता की दृष्टि से इस मामले का विश्लेषण करें, तो पुलिस की विवेचना में कुछ ऐसी कमियां रहीं जिन्होंने केस की नींव कमजोर कर दी:
- DNA रिपोर्ट की विफलता: अभियोजन पक्ष के लिए सबसे बड़ा झटका FSL भोपाल से आई डीएनए रिपोर्ट रही। पीड़िता और मुख्य आरोपी के सैंपल घटना की पुष्टि करने में वैज्ञानिक रूप से विफल रहे।
- मेडिकल साक्ष्य का अभाव: डॉ. सरिता शाह की चिकित्सीय रिपोर्ट में पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या चोट के कोई निशान नहीं पाए गए, जो अक्सर ‘जबरदस्ती’ के मामलों में महत्वपूर्ण साक्ष्य होते हैं।
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अभियोजन की विफलता: मुकरते गवाह और उम्र का विवाद
न्यायालय में अभियोजन पक्ष (Prosecution) अपनी कहानी को मजबूती से साबित करने में विफल रहा। सबसे बड़ी चुनौती पीड़िता की आयु को लेकर रही।
- विरोधाभासी बयान: गवाही के दौरान पीड़िता अपनी ही जन्मतिथि को लेकर भ्रमित दिखी। कभी उसने खुद को नाबालिग बताया तो कभी उसके बयानों से उसकी आयु 18 वर्ष से अधिक प्रतीत हुई।
- होस्टाइल गवाह: अभियोजन ने कुल 10 गवाह पेश किए, लेकिन महत्वपूर्ण मोड़ पर पीड़िता और उसके माता-पिता अपने पहले दिए गए बयानों से मुकर गए। जब मुख्य गवाह ही ‘पक्षद्रोही’ (Hostile) हो जाएं, तो केस को बचाना लगभग असंभव हो जाता है।
न्यायालय का फैसला और सामाजिक संदेश
लंबी सुनवाई के बाद न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि अभियोजन पक्ष अपना मामला ‘संदेह से परे’ (Beyond Reasonable Doubt) साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। साक्ष्यों की कड़ी टूटने और गवाहों के पलटने के कारण अदालत ने आरोपियों शिवम साकेत, रामगोविंद और नरेंद्र को दोषमुक्त कर दिया।
यह मामला पुलिस और अभियोजन विभाग के लिए एक सबक है। केवल FIR दर्ज करना और बयान लेना काफी नहीं है; अदालती कार्यवाही में वैज्ञानिक साक्ष्यों का सटीक संकलन और गवाहों की सुरक्षा व काउंसलिंग अनिवार्य है। इस फैसले ने एक बार फिर साबित किया है कि न्याय की तराजू केवल ठोस सबूतों पर झुकती है।







