सिंगरौली-कानून की एक छोटी सी चूक या किसी की गलत मंशा किसी का जीवन कैसे बर्बाद कर सकती है, इसकी बानगी सिंगरौली जिला न्यायालय के ताजा फैसले में देखने को मिली। थाना माड़ा के अंतर्गत आने वाले खैरवाही के जिस ‘सामूहिक दुष्कर्म’ मामले ने पूरे जिले को दहला दिया था, वह अदालत की दहलीज पर आकर पूरी तरह ताश के पत्तों की तरह ढह गया। विशेष न्यायाधीश श्रीमती कंचन गुप्ता ने तीनों आरोपियों को बाइज्जत बरी करते हुए उनके माथे से ‘बलात्कारी’ का दाग धो दिया है।
1. झूठे जाल की साजिश: जब गवाहों ने ही खोली पोल
इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि जिस पीड़िता ने FIR दर्ज कराई थी, अदालत में उसने और उसके परिवार ने जो कुछ कहा, उसने पूरी कहानी पर ही सवालिया निशान लगा दिए।
- मुकर गई पीड़िता: अभियोक्त्री (पीड़िता) ने अदालत में दिए बयानों में न केवल घटना से इनकार किया, बल्कि अपनी उम्र और आरोपियों की पहचान को लेकर भी ऐसे विरोधाभासी बयान दिए जिससे साफ हो गया कि मामले में वह सच्चाई नहीं थी जो कागजों पर लिखी गई थी।
- माता-पिता का यू-टर्न: जो पिता अपनी बेटी के लिए न्याय मांग रहा था, उसने भी अदालत में आरोपियों के पक्ष में या घटना से अनभिज्ञता जाहिर करते हुए बयान दिए। इससे यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या यह मामला किसी आपसी रंजिश या दबाव में दर्ज कराया गया था?
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2. विज्ञान ने भी दी बेगुनाही की गवाही (The DNA Truth)
पुलिस ने इस केस को ‘वाटर टाइट’ बनाने के लिए DNA टेस्ट का सहारा लिया था। लेकिन एफएसएल (FSL) भोपाल की रिपोर्ट ने पुलिस की सारी थ्योरी को खारिज कर दिया।
- DNA रिपोर्ट नेगेटिव: मुख्य आरोपी और पीड़िता के सैंपल मैच नहीं हुए। वैज्ञानिक रूप से यह साबित हो गया कि आरोपियों का इस घटना से कोई जैविक संबंध नहीं था।
- मेडिकल रिपोर्ट: डॉक्टर ने भी स्पष्ट किया कि पीड़िता के शरीर पर न तो कोई खरोंच थी और न ही संघर्ष के निशान। यह इस बात का पुख्ता सबूत था कि ‘सामूहिक दुष्कर्म’ की कहानी मनगढ़ंत थी।
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3. तीन साल की ‘सामाजिक मौत’ का जिम्मेदार कौन?
शिवम, रामगोविंद और नरेंद्र ने पिछले 3 साल कानून की कड़वी प्रक्रिया और जेल की सलाखों के पीछे बिताए। समाज ने उन्हें अपराधी मान लिया था, लेकिन कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष के पास एक भी ऐसा ठोस सबूत नहीं था जो उन्हें दोषी ठहरा सके।
- जांच की कमियां: विवेचना अधिकारी ने साक्ष्यों को बिना बारीकी से परखे जल्दबाजी में चार्जशीट पेश की।
- पॉक्सो एक्ट का दुरुपयोग: यह केस एक बार फिर बहस छेड़ता है कि पॉक्सो जैसे सख्त कानूनों का इस्तेमाल कई बार निजी दुश्मनी निकालने के लिए ‘हथियार’ के रूप में किया जाता है।
देर से मिला लेकिन ‘सही’ न्याय
अदालत ने अपने 37 पन्नों के विस्तृत फैसले में आरोपियों को दोषमुक्त करते हुए उनके व्यक्तिगत मुचलके और जमानत बांडों को समाप्त कर दिया है। हालांकि वे अब आजाद हैं, लेकिन सवाल वही है कि उनके जीवन के जो 3 साल इस झूठे आरोप की भेंट चढ़ गए, उसकी भरपाई कौन करेगा?







