नई दिल्ली: देश की सबसे कठिन परीक्षा UPSC की तैयारी के लिए ‘मक्का-मदीना’ कहे जाने वाले दिल्ली के करोल बाग और ओल्ड राजेंद्र नगर (ORN) से एक कड़वी सच्चाई सामने आ रही है। यहाँ कुछ लाइब्रेरी संचालकों ने पूरी व्यवस्था को एक संगठित ‘लूट के अड्डे’ में तब्दील कर दिया है। लाखों का सपना लेकर आने वाले छात्रों को विद्यार्थी नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता ‘ATM मशीन’ समझा जा रहा है।
मनमानी फीस और ‘एहसान’ का रवैया
एक समय था जब लाइब्रेरी शांत अध्ययन का केंद्र हुआ करती थी, लेकिन आज यह मुनाफे का सबसे बड़ा कारोबार बन चुकी है। ग्राउंड रिपोर्ट और हमारे पास आ रही लगातार शिकायतों के अनुसार, यहाँ Plotting Seat (अस्थायी सीट) के नाम पर 1500 से 2000 रुपये वसूले जा रहे हैं। यदि किसी छात्र को एक फिक्स सीट चाहिए, ताकि उसे रोज़ाना अपनी किताबें न उठानी पड़ें, तो यह किराया 3000 से 3500 रुपये प्रति माह तक पहुँच जाता है।
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हैरानी की बात यह है कि इतनी मोटी रकम वसूलने के बावजूद छात्रों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है जैसे उन पर बहुत बड़ा ‘एहसान’ किया जा रहा हो।
तानाशाही नियम: नॉन-रिफंडेबल का जाल
लाइब्रेरी संचालकों का सबसे क्रूर नियम है ‘नॉन-रिफंडेबल फीस’। यदि किसी छात्र को माहौल पसंद नहीं आता, एसी काम नहीं कर रहा या लाइट की सुविधा खराब है, तो वह अपनी फीस वापस नहीं मांग सकता। एक बार पैसा गया तो वह डूब गया। आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए यह किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं है।
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“हम घर से गिनकर पैसे लाते हैं। प्रिलिम्स सिर पर है, और यहाँ लाइब्रेरी वाले एक-एक दिन का हिसाब लेकर पैसे वसूलते हैं। अगर दो दिन देरी हो जाए तो सीट किसी और को बेच दी जाती है।” एक पीड़ित अभ्यर्थी
मानसिक दबाव और संसाधनों की कमी
UPSC अभ्यर्थी पहले से ही बेरोजगारी, परिवार की उम्मीदों और भारी-भरकम सिलेबस के बोझ तले दबा होता है। परीक्षा के इस संवेदनशील समय में, जब उसे शांत माहौल की ज़रूरत है, उसे इस तरह के आर्थिक और मानसिक शोषण का शिकार बनाया जा रहा है।
प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग
यह केवल एक छोटे से इलाके की बात नहीं है, बल्कि उस ‘एजुकेशन हब’ की छवि का सवाल है जहाँ से देश के भावी अफसर निकलते हैं। अगर यही हाल रहा, तो मध्यमवर्गीय और गरीब मेधावी छात्रों के लिए दिल्ली में रहकर पढ़ाई करना सिर्फ एक सपना रह जाएगा।
कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरी संचालकों को यह समझने की ज़रूरत है कि छात्र उनकी तिजोरियाँ भरने का जरिया नहीं हैं। प्रिलिम्स से पहले इस तरह की आर्थिक लूट बंद होनी चाहिए। प्रशासन को इन निजी लाइब्रेरियों के लिए एक ‘कैपिंग’ (अधिकतम फीस सीमा) और ‘रिफंड पॉलिसी’ तय करनी चाहिए, ताकि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ न हो।







