जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को सर्वोपरि रखते हुए ‘डिफॉल्ट जमानत’ (Default Bail) के संबंध में एक अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि जांच एजेंसियां निर्धारित समय सीमा के भीतर चार्जशीट (चालान) पेश करने में विफल रहती हैं, तो आरोपी को जमानत मिलना उसका ‘अपरिहार्य अधिकार’ (Indefeasible Right) बन जाता है, जिसे किसी भी तकनीकी आधार पर छीना नहीं जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक आरोपी की जमानत याचिका से जुड़ा है, जिसे निचली अदालत ने तकनीकी आधार पर खारिज कर दिया था। निचली अदालत का तर्क था कि जिस दिन पुलिस ने चालान पेश किया, उसी दिन आरोपी ने डिफॉल्ट जमानत के लिए आवेदन दिया था, इसलिए उसे राहत नहीं दी जा सकती। इसी आदेश को आरोपी ने हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।
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हाई कोर्ट का सख्त रुख: “समय सीमा की पाबंदी जरूरी”
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति द्वारकाधीश बंसल की एकल पीठ ने निचली अदालत के तर्क को सिरे से खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति बंसल ने कानून की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि:
- समय सीमा: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और पूर्ववर्ती CrPC के तहत पुलिस को गंभीर मामलों में 60 या 90 दिनों के भीतर चालान पेश करना अनिवार्य है।
- अधिकार का उदय: जैसे ही 60 या 90 दिन की अवधि समाप्त होती है और चालान पेश नहीं होता, आरोपी का जमानत का हक स्वतः पैदा हो जाता है।
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- तकनीकी बाधा नहीं: कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि यदि समय सीमा का आखिरी दिन कोर्ट की छुट्टी है और पुलिस अगले कार्य दिवस पर चालान पेश करती है, तब भी आरोपी को देरी का लाभ मिलेगा। पुलिस ‘कोर्ट बंद होने’ का बहाना बनाकर आरोपी के मौलिक अधिकार को बाधित नहीं कर सकती।
निचली अदालत का आदेश रद्द
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में निचली अदालत के आदेश को दोषपूर्ण माना और उसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि आरोपी को तत्काल जमानत पर रिहा किया जाए। इस फैसले ने उन हजारों विचाराधीन कैदियों के लिए उम्मीद की किरण जगाई है, जिनकी सुनवाई पुलिस की सुस्त जांच के कारण अटकी रहती है।
न्यायिक सक्रियता और पारदर्शिता
यह फैसला विशेष रूप से सिंगरौली, सीधी और अन्य जिलों की निचली अदालतों के लिए एक नजीर साबित होगा। हाल ही में विंध्य क्षेत्र में न्यायिक पारदर्शिता और सुरक्षा पर दिए जा रहे जोर के बीच, हाई कोर्ट का यह रुख यह संदेश देता है कि न्यायपालिका पुलिस की लापरवाही को आरोपी की स्वतंत्रता पर हावी नहीं होने देगी।
सांख्यिकी और डेटा
- अधिकार क्षेत्र: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण।
- समय सीमा: 10 साल से कम सजा वाले मामलों में 60 दिन और 10 साल या उससे अधिक सजा वाले मामलों में 90 दिन।
- प्रभाव: इस फैसले से राज्य की जेलों में बंद उन कैदियों को लाभ मिल सकता है जिनके मामलों में 90 दिन बाद भी पुलिस साक्ष्य जुटाने में विफल रही है।
मामले की मुख्य भौगोलिक और न्यायिक जानकारी:
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न्यायालय: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर।
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संबंधित जिला (निचली अदालत): यह मामला मुख्य रूप से भोपाल की निचली अदालत (NDPS एक्ट के विशेष न्यायाधीश) के एक आदेश से उपजा था, जिसे हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।
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दिनांक: हाई कोर्ट ने इस पर विस्तृत सुनवाई कर अप्रैल 2026 में अंतिम आदेश पारित किया।
विवाद का मुख्य केंद्र (The Core Issue):
निचली अदालत ने आरोपी की ‘डिफॉल्ट बेल’ की अर्जी सिर्फ इसलिए खारिज कर दी थी क्योंकि जिस दिन 60 दिन पूरे हुए, उसके अगले कुछ दिनों तक कोर्ट में छुट्टियां थीं। पुलिस ने छुट्टियां खत्म होने के बाद चालान पेश किया। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि:
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जबलपुर हाई कोर्ट ने माना कि पुलिस छुट्टियों का फायदा नहीं उठा सकती।
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यदि 60वां या 90वां दिन रविवार या छुट्टी है, तो भी पुलिस को रिमांड ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने चालान पेश करना चाहिए था।
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आरोपी ने चालान पेश होने से मात्र 30 मिनट पहले (दोपहर 12:30 बजे) बेल अर्जी लगा दी थी, जबकि पुलिस ने 1:00 बजे चालान पेश किया। इस आधे घंटे की फुर्ती ने आरोपी को उसका ‘अपरिहार्य अधिकार’ दिला दिया।
यह फैसला अब मध्य प्रदेश के सभी जिलों (जैसे सिंगरौली, सीधी, रीवा आदि) की निचली अदालतों के लिए एक कानूनी मिसाल बन गया है।







