भारत में इच्छामृत्यु को लेकर वर्षों से चल रही कानूनी और नैतिक बहस के बीच एक ऐतिहासिक मोड़ सामने आया है। गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को 13 साल तक कोमा में रहने के बाद अब इच्छामृत्यु की अनुमति मिल चुकी है और उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में शिफ्ट किया गया है, जहां डॉक्टरों की निगरानी में धीरे-धीरे उनका लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाया जा रहा है।
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यह मामला केवल एक व्यक्ति की मेडिकल स्थिति तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत में “गरिमा के साथ मृत्यु” (Right to Die with Dignity) की बहस को नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।
13 साल से कोमा में थे हरीश राणा
हरीश राणा की जिंदगी 2013 में अचानक बदल गई थी, जब एक दुर्घटना के बाद उन्हें गंभीर सिर की चोट आई और वे स्थायी वेजिटेटिव स्टेट (Permanent Vegetative State) में चले गए। तब से वे पूरी तरह मशीनों और मेडिकल सपोर्ट पर निर्भर थे। डॉक्टरों की कई रिपोर्टों में यह साफ हो चुका था कि उनके ठीक होने की संभावना लगभग खत्म हो चुकी है।
परिवार ने 13 वर्षों तक उम्मीद नहीं छोड़ी। इलाज, देखभाल और अस्पताल के खर्चों के बीच यह एक लंबी और भावनात्मक लड़ाई बन गई, जिसने पूरे परिवार की जिंदगी बदल दी।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने इस मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितियों को देखते हुए हरीश राणा के लिए पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia) की अनुमति दी।
पैसिव यूथेनेशिया का मतलब है कि मरीज को कृत्रिम लाइफ सपोर्ट या क्लिनिकल न्यूट्रिशन जैसी जीवनरक्षक व्यवस्थाओं को हटाकर प्राकृतिक मृत्यु की ओर जाने दिया जाता है। यह सक्रिय इच्छामृत्यु से अलग होता है, जिसमें सीधे जीवन समाप्त करने की कार्रवाई शामिल होती है।
एम्स में शुरू हुई मेडिकल प्रक्रिया
अदालत के निर्देश के बाद हरीश राणा को दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के पेलिएटिव केयर विभाग में भर्ती किया गया है। यहां विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रही है और लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।







