नई दिल्ली-भारतीय राजनीति में आज का दिन ऐतिहासिक गहमागहमी का गवाह बन रहा है। संसद में ‘संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026’ के गिर जाने के बाद से देश का सियासी तापमान चरम पर है। लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्य शर्त पूरी न हो पाने के कारण यह महत्वाकांक्षी बिल कानून का रूप नहीं ले सका, जिसके बाद सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने देशव्यापी आंदोलन का बिगुल फूंक दिया है।
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सड़कों पर उतरा NDA: विपक्षी गठबंधन पर ‘महिला विरोधी’ होने का आरोप
आज सुबह से ही भाजपा महिला मोर्चा के नेतृत्व में देश के सभी जिला मुख्यालयों पर भारी विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। प्रदर्शनकारी हाथों में तख्तियां लिए विपक्ष के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि यह बिल भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की 33% हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का एक क्रांतिकारी कदम था, जिसे विपक्ष ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के कारण रोक दिया।
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- प्रस्तावित आरक्षण: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें।
- मतदान का परिणाम: बिल को साधारण बहुमत तो मिला, लेकिन संविधान संशोधन के लिए आवश्यक 66.6% (दो-तिहाई) वोटिंग का आंकड़ा छूने में सरकार विफल रही।
- विरोध प्रदर्शन: देश के लगभग 700 से अधिक जिलों में आज भाजपा और सहयोगी दलों का प्रदर्शन जारी है।
विपक्ष की दलील ‘उत्तरी-दक्षिणी भारत का विभाजन
दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने बिल का विरोध करने के अपने कारणों को स्पष्ट किया है। विपक्ष का मुख्य प्रहार बिल को जनगणना और परिसीमन (Delimitation) से जोड़ने पर है। विपक्षी नेताओं का तर्क है कि यदि 2026 के परिसीमन के आधार पर सीटें तय की गईं, तो दक्षिण भारतीय राज्यों (जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया है) की सीटें कम हो जाएंगी और उत्तर भारतीय राज्यों का वर्चस्व बढ़ जाएगा। विपक्ष इसे “संघीय ढांचे पर हमला” और “उत्तर-दक्षिण का विभाजन” करार दे रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महिला आरक्षण बिल का गिरना आगामी चुनावों में एक बड़ा मुद्दा बनेगा। जहां सरकार इसे ‘महिला सशक्तिकरण’ के अपमान के रूप में पेश करेगी, वहीं विपक्ष इसे ‘क्षेत्रीय अधिकारों की रक्षा’ की लड़ाई बताएगा। फिलहाल, देश की आधी आबादी इस सियासी खींचतान के बीच अभी भी संसद में अपनी उचित हिस्सेदारी का इंतजार कर रही है।







