सिंगरौली-न्याय के गलियारों में अक्सर दांव-पेच और भावनाओं का ज्वार देखने को मिलता है, लेकिन अंततः जीत उसी की होती है जिसके पास सत्य और साक्ष्यों का संबल होता है। सिंगरौली के बैढ़न थाने से जुड़े एक बहुचर्चित मामले में, जिसे ‘शादी का झांसा देकर बलात्कार’ का रंग दिया गया था, न्यायालय ने दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है। द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश श्रीमती कंचन गुप्ता के न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए आरोपी राकेश कुमार शाह को सभी कलंकपूर्ण आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया। यह फैसला न केवल एक व्यक्ति की स्वतंत्रता की बहाली है, बल्कि उन लोगों के लिए भी एक कड़ा सबक है जो कानून को निजी स्वार्थ और प्रतिशोध का हथियार बनाते हैं।
बरसों का सन्नाटा और फिर अचानक आरोपों का शोर
इस केस की जड़ें 2015 से 2019 के बीच बताई गईं, जिसमें पीड़िता ने आरोप लगाया था कि राकेश शाह ने उसे विवाह का वचन देकर कई शहरों के होटलों में उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। हालांकि, पत्रकारिता की खोजी दृष्टि से देखें तो इस कहानी में सबसे बड़ा झोल ‘समय’ का था। 2019 तक की कथित घटनाओं के लिए 2021 में FIR दर्ज कराना ही इस मामले की विश्वसनीयता पर पहला बड़ा प्रहार था। न्यायालय ने भी इस भारी विलंब को संदेहास्पद माना, क्योंकि इस दौरान पीड़िता की खामोशी किसी ‘मजबूरी’ से ज्यादा ‘आपसी सहमति’ की ओर इशारा कर रही थी।
मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों के बयानों में छिपी सच्चाई
न्यायालय में जब साक्ष्यों का पिटारा खुला, तो अभियोजन पक्ष की कहानी ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगी। डॉक्टर विमला खेस (अ.सा. 8) की मेडिकल रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि पीड़िता के शरीर पर संघर्ष या जबरदस्ती का कोई भी निशान नहीं था। वहीं, होटल के मैनेजरों (अ.सा. 4 व 5) ने अदालत में किसी भी अप्रिय या संदिग्ध घटना की जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया। एक विद्वान पत्रकार के रूप में विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि जब मुख्य आधार (स्वतंत्र गवाह और वैज्ञानिक साक्ष्य) ही साथ छोड़ दें, तो आरोपों की इमारत खड़ी नहीं रह सकती।
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जांच की खामियां और अभियोजन का ध्वस्त होता किला
जांच अधिकारी उपनिरीक्षक प्रियंका सिंह बघेल (अ.सा. 9) की विवेचना में कई ऐसी खामियां पाई गईं, जिन्हें एक ‘प्रोफेशनल’ जांच की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। पुलिस न तो उन होटलों का रिकॉर्ड पेश कर पाई और न ही कोई ऐसा तकनीकी साक्ष्य (CCTV या डिजिटल फुटप्रिंट) जो यह साबित करे कि वहां कोई अपराध हुआ था। अभियोजन पक्ष के गवाहों का एक के बाद एक मुकरना (Hostile होना) यह साबित करने के लिए पर्याप्त था कि मामला कानून की धाराओं से ज्यादा ‘मनगढ़ंत कहानियों’ पर टिका था।
न्यायालय का कड़ा रुख और न्याय का मानवीय चेहरा
न्यायाधीश ने अपने फैसले में जिस गंभीरता के साथ ‘व्यक्तिगत स्वतंत्रता’ और ‘साक्ष्य आधारित न्याय’ की बात कही है, वह काबिले तारीफ है। न्यायालय ने रेखांकित किया कि “शादी का झांसा” केवल तब अपराध की श्रेणी में आता है जब आरोपी की नीयत शुरू से ही धोखा देने की हो, न कि तब जब स्थितियां बाद में बदल जाएं। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि किसी के सामाजिक सम्मान को केवल आरोपों के आधार पर धूल में नहीं मिलाया जा सकता। “सौ अपराधी छूट जाएं लेकिन एक निर्दोष को सजा न हो” – कानून का यह बुनियादी सिद्धांत इस फैसले की आत्मा है।
कानून का संरक्षण, दुरुपयोग नहीं
अंततः, सिंगरौली जिला अदालत का यह फैसला भारतीय न्यायपालिका की उस शुचिता को बरकरार रखता है जहाँ सत्य ही सर्वोच्च है। यह रिपोर्ट उन सभी के लिए एक आईना है जो झूठे मुकदमों के जरिए किसी का जीवन बर्बाद करने की कोशिश करते हैं। आरोपी राकेश कुमार शाह की दोषमुक्ति ने यह सिद्ध कर दिया है कि भले ही इंसाफ की चक्की धीरे चलती हो, लेकिन जब वह चलती है, तो झूठ का हर कंकड़ पीसकर अलग कर देती है।







