नई दिल्ली: चार साल की मासूम बच्ची से दुष्कर्म के मामले में जांच में गंभीर लापरवाही पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुग्राम पुलिस को तीखी फटकार लगाते हुए देशभर की कानून-व्यवस्था प्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। 24 मार्च 2026 को हुई सुनवाई में अदालत ने पुलिस अधिकारियों से सीधे पूछा “क्या आप अपनी चार साल की बच्ची के साथ ऐसा बर्ताव करते हो?” यह टिप्पणी न केवल मामले की संवेदनशीलता को रेखांकित करती है, बल्कि यह भी बताती है कि न्यायपालिका अब बच्चों से जुड़े अपराधों में किसी तरह की ढिलाई स्वीकार करने को तैयार नहीं है।
2022 की घटना से सुप्रीम कोर्ट तक का लंबा सफर
यह मामला 2022 का है, जब गुरुग्राम के सेक्टर-57 इलाके में एक पड़ोसी द्वारा चार साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म की घटना सामने आई थी। पीड़ित परिवार ने तुरंत शिकायत दर्ज कराई, लेकिन शुरुआती जांच में पुलिस की सुस्ती और प्रक्रियात्मक चूकें सामने आईं। मेडिकल जांच में सात दिन की देरी और साक्ष्य संकलन में लापरवाही ने केस को कमजोर कर दिया, जिसके चलते आरोपी को जमानत मिल गई। परिवार ने न्याय की तलाश में उच्च न्यायालय का रुख किया, लेकिन वहां से अपेक्षित राहत न मिलने पर मामला अंततः सर्वोच्च अदालत पहुंचा।
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जस्टिस गवई और जस्टिस कुमार की कड़ी फटकार
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार की पीठ ने पुलिस की रिपोर्ट पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत ने साफ कहा कि बच्चों के खिलाफ अपराधों में “जीरो टॉलरेंस” नीति होनी चाहिए और जांच में देरी को किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता। पुलिस की ओर से मेडिकल टीम की अनुपलब्धता का हवाला दिया गया, जिसे अदालत ने अस्वीकार करते हुए इसे प्रशासनिक विफलता करार दिया।
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POCSO कानून और कमजोर दोषसिद्धि दर पर सवाल
इस प्रकरण ने देश में पॉक्सो (POCSO) कानून के क्रियान्वयन पर भी बहस तेज कर दी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि बाल यौन अपराधों में दोषसिद्धि दर अभी भी चिंताजनक रूप से कम है। विशेषज्ञों का मानना है कि जांच की गुणवत्ता, समयबद्ध कार्रवाई और पीड़ितों के प्रति संवेदनशील व्यवहार में सुधार के बिना इस कानून का प्रभाव सीमित ही रहेगा।
सरकार और विपक्ष आमने-सामने, कार्रवाई तेज
राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी इस फैसले के तत्काल प्रभाव देखने को मिले हैं। हरियाणा सरकार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। विपक्ष ने इसे कानून-व्यवस्था की विफलता बताते हुए पुलिस सुधार की मांग तेज कर दी है। पूर्व पुलिस अधिकारियों और बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह मामला केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस व्यापक समस्या का संकेत है जिसमें संवेदनशील मामलों को भी सामान्य अपराध की तरह लिया जाता है।
देशभर की पुलिसिंग प्रणाली पर पड़ सकता है असर
इस फैसले का व्यापक असर देशभर की पुलिसिंग प्रणाली पर पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख से यह संकेत गया है कि बच्चों के खिलाफ अपराधों में जांच की गुणवत्ता और जवाबदेही को लेकर अब कोई समझौता नहीं होगा। यह न्यायपालिका द्वारा संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
अगले 15 दिन अहम, रिपोर्ट और कार्रवाई पर नजर
फिलहाल अदालत ने गुरुग्राम पुलिस को 15 दिनों के भीतर विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है और आरोपी की जमानत पर रोक लगा दी है। साथ ही पीड़िता को मुआवजा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के आदेश भी दिए गए हैं। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह न्यायिक हस्तक्षेप पुलिस व्यवस्था में ठोस सुधार की दिशा में बदलाव ला पाता है या यह मामला भी केवल एक चेतावनी बनकर रह जाता है।







