सिंगरौली -मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले की जिला अदालत ने करीब सात साल पुराने डकैती की साजिश मामले में सभी सात आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया है। तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश धर्मेन्द्र सोनी ने 18 मार्च 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में पूरी तरह असफल रहा।
पुलिस की कहानी पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
अदालत ने अपने निर्णय में पुलिस द्वारा प्रस्तुत घटनाक्रम पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाए। न्यायालय ने कहा कि जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्य न केवल अपर्याप्त थे, बल्कि कई स्तरों पर परस्पर विरोधी भी पाए गए, जिससे अभियोजन की पूरी कहानी अविश्वसनीय हो गई।
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क्या था पूरा मामला
अभियोजन के अनुसार 30 जून 2017 की रात पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि भलछेड़ा जंगल के पास कुछ लोग सड़क पर पत्थर रखकर राहगीरों को लूटने और डकैती डालने की योजना बना रहे हैं। पुलिस ने मौके पर पहुंचकर तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया, जबकि अन्य चार फरार हो गए थे। बाद में सभी सातों को गिरफ्तार कर उनके खिलाफ धारा 399 और 402 भारतीय दंड संहिता के तहत मामला दर्ज किया गया।
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गवाहों के मुकरने से कमजोर पड़ा केस
मामले की सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा झटका अभियोजन को तब लगा, जब स्वतंत्र गवाह (पंच साक्षी) अदालत में अपने पूर्व बयानों से मुकर गए। उन्होंने पुलिस की कार्रवाई जप्ती और गिरफ्तारी की पुष्टि करने से इनकार कर दिया, जिससे केस की नींव ही कमजोर हो गई।
पुलिस गवाही में ही दिखे विरोधाभास
अदालत ने यह भी पाया कि रेड में शामिल पुलिसकर्मियों के बयानों में ही स्पष्ट विरोधाभास थे। एक गवाह ने बताया कि टीम बोलेरो वाहन से मौके पर पहुंची, जबकि दूसरे ने खुद को दोपहिया वाहन से गश्त करते हुए वहां पहुंचना बताया। इस तरह के अंतर ने पूरी कार्रवाई की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा किया।
सबूतों की कमी ने बढ़ाई मुश्किल
न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपी वास्तव में डकैती की योजना बना रहे थे। किसी भी गवाह ने उन्हें आपस में योजना बनाते या चर्चा करते हुए नहीं सुना था, जो इस तरह के मामलों में एक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है।
हथियार पेश न करना बना अहम कारण
पुलिस ने आरोप लगाया था कि आरोपियों से लोहे की रॉड बरामद की गई थीं, लेकिन इन कथित हथियारों को अदालत में पेश नहीं किया गया। न्यायालय ने इसे जांच की गंभीर खामी माना और कहा कि केवल कथित जप्ती के आधार पर अपराध की तैयारी सिद्ध नहीं की जा सकती।
कानूनी कसौटी पर नहीं टिक सका अभियोजन
अंततः अदालत ने माना कि अभियोजन का पूरा मामला संदेह से परे प्रमाणित नहीं हो सका। इसी आधार पर सभी सातों आरोपियों को धारा 399 और 402 के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया गया। यह फैसला एक बार फिर यह रेखांकित करता है कि आपराधिक मामलों में ठोस और सुसंगत साक्ष्य कितने आवश्यक होते हैं।







