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तिरुवनंतपुरम की सड़कों से ‘नारी शक्ति’ का उद्घोष प्रधानमंत्री ने केरल में भरी हुंकार

By: डिजिटल डेस्क

On: Sunday, April 5, 2026 11:42 AM

PM Narendra Modi roadshow in Thiruvananthapuram Kerala 2026
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विशेष संवाददाता, तिरुवनंतपुरम -मंगलवार को केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम की सड़कें सिर्फ लोगों से नहीं भरी थीं, बल्कि वे एक नए राजनीतिक नैरेटिव (Political Narrative) की गवाह बन रही थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘विशाल रोड शो’ केवल एक शक्ति प्रदर्शन नहीं था; यह सुदूर दक्षिण के उस राज्य में पैठ बनाने की कोशिश थी, जहाँ भाजपा ऐतिहासिक रूप से संघर्ष करती रही है। फूलों से लदी जीप पर सवार प्रधानमंत्री, जब पारंपरिक ‘कसावु’ मुंडू (Kasavu Mundu) पहने उत्साहित भीड़ की ओर हाथ हिला रहे थे, तो चेहरों पर उत्साह साफ झलक रहा था। पत्रकारिता के अनुभव से कहूँ तो, यह भीड़ केवल कौतूहलवश नहीं जुटी थी, बल्कि इसमें एक वर्ग ऐसा था जो प्रधानमंत्री के ‘विकास’ और ‘महिला सशक्तिकरण’ के संदेश को सीधे तौर पर सुनने आया था। यह ‘ब्रांड मोदी’ और केरल के जटिल सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने के बीच एक नया और अनूठा संवाद था।

अचानक संसद सत्र बढ़ाने की घोषणा और इसका व्यापक संदेश

इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक हिस्सा वह पल था, जब प्रधानमंत्री ने एक सभा को संबोधित करते हुए एक बड़ी घोषणा की। उन्होंने जानकारी दी कि नई दिल्ली में चल रहे ‘संसद के बजट सत्र’ को तीन दिनों के लिए बढ़ा दिया गया है। संसद की कार्यवाही को इस तरह अचानक बढ़ाना, वह भी प्रधानमंत्री द्वारा एक सार्वजनिक सभा में घोषित करना, एक दुर्लभ घटना है। यह सामान्य विधायी कार्य का हिस्सा नहीं लग रहा था, बल्कि इसके पीछे एक गहरी रणनीतिक मंशा थी। पत्रकारिता की गहरी समझ रखने वाला कोई भी व्यक्ति इसे ‘ऑप्टिक्स’ (Optics) और ‘पॉलिसी’ (Policy) के एक चतुर मिश्रण के रूप में देखेगा। यह केरल के मतदाताओं के लिए एक स्पष्ट संदेश था – “हम दिल्ली में आपके लिए, और विशेष रूप से महिलाओं के लिए, गंभीर हैं।”

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2023 के ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ से 2029 के कार्यान्वयन का सफर

प्रधानमंत्री की इस घोषणा का सीधा और एकमात्र उद्देश्य 2023 में संसद द्वारा सर्वसम्मति से पारित ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण कानून) के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करना है। यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करता है। लेकिन, इसके लागू होने को लेकर कई संशय थे, विशेष रूप से जनगणना और परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया के साथ इसके जुड़ाव को लेकर। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि यह सत्र विस्तार, “कार्यान्वयन की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने और प्रशासनिक ढांचा तैयार करने” के लिए आवश्यक था। लक्ष्य बिल्कुल साफ है – 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले इस कानून को पूरी तरह से लागू कर देना। यह घोषणा उन आलोचकों को करारा जवाब थी जो महिला आरक्षण को केवल एक चुनावी जुमला मान रहे थे। प्रधानमंत्री ने इस पर जोर देकर यह साबित करने की कोशिश की कि “जो कहा, वो किया” (Delivery based politics) भाजपा की पहचान है।

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केरल की महिलाओं पर केंद्रित राजनीति और ‘महिला-विरोधी’ इमेज को तोड़ने का प्रयास

केरल की जनसांख्यिकी और उच्च साक्षरता दर को देखते हुए, यहाँ महिला मतदाता एक बेहद निर्णायक शक्ति हैं। प्रधानमंत्री द्वारा यहाँ महिला आरक्षण पर इतना जोर देना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। वे न केवल भाजपा की पहुँच (Outreach) को बढ़ाना चाहते हैं, बल्कि राज्य के विपक्षी दलों द्वारा भाजपा पर अक्सर लगाए जाने वाले ‘पितृसत्तात्मक’ या ‘महिला-विरोधी’ आरोपों को भी काट रहे हैं। यह सिर्फ एक कानून की बात नहीं थी, बल्कि यह केरल की शिक्षित, जागरूक महिलाओं के “आकांक्षात्मक भारत” (Aspirational India) से जुड़ने का प्रयास था। प्रधानमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की कि दिल्ली में एक ऐसी सरकार है जो उनके अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए संसद का समय भी बढ़ा सकती है।

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ‘नारी शक्ति’ को एक सशक्त आधार

अंततः, तिरुवनंतपुरम की सड़कों से निकला यह संदेश – “सजा नहीं, समाधान” के नारे से (जो कि व्यापारिक नियमों के गैर-अपराधीकरण से संबंधित है) अलग होकर भी, उसी “आत्मविश्वास” और “भरोसे” की बात करता है। प्रधानमंत्री जन विश्वास विधेयक के माध्यम से उद्यमियों पर भरोसा जता रहे हैं, और महिला आरक्षण के कार्यान्वयन के माध्यम से वे भारत की आधी आबादी पर भरोसा जता रहे हैं कि वे देश के भविष्य को संवारने में सक्रिय भूमिका निभा सकती हैं। यह कानून केवल संसद में सीटें बढ़ाने के लिए नहीं है; यह भारत के सामाजिक-आर्थिक ढांचे को ‘नारी शक्ति’ के माध्यम से आत्मनिर्भर बनाने का एक साहसी और दूरगामी कदम है। एक वरिष्ठ पत्रकार के रूप में, मैं इस यात्रा और घोषणा को केवल एक राजनीतिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखता हूँ, जो 2029 तक एक नए, अधिक समावेशी भारत की नींव रख रहा है।

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