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Health Insurance होने के बावजूद जेब से पैसा क्यों जाता है? जानें असली कारण आसान भाषा में।

By: विकाश विश्वकर्मा

On: Friday, March 20, 2026 9:37 AM

Health Insurance India
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भारत में हेल्थ इंश्योरेंस अब एक जरूरत बन चुका है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि पॉलिसी होने के बाद भी लोगों को अस्पताल में इलाज के दौरान अपनी जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं। यह सवाल अक्सर लोगों के मन में आता है, जब इंश्योरेंस लिया है, तो पूरा खर्च क्यों नहीं कवर होता?

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1. ‘को-पेमेंट’ का छिपा हुआ असर

कई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी में ‘को-पेमेंट’ का क्लॉज होता है। इसका मतलब है कि कुल बिल का एक हिस्सा आपको खुद देना होगा, चाहे बाकी खर्च कंपनी कवर करे।

उदाहरण के तौर पर, अगर आपका बिल 1 लाख रुपये है और को-पेमेंट 10% है, तो आपको 10,000 रुपये अपनी जेब से देने होंगे। यह शर्त खासकर सीनियर सिटीजन पॉलिसीज़ में आम होती है।

3. नॉन-पेयेबल आइटम्स की लंबी सूची

इंश्योरेंस कंपनियां कई मेडिकल खर्चों को ‘नॉन-पेयेबल’ कैटेगरी में रखती हैं। इसमें शामिल हो सकते हैं:

  • ग्लव्स, मास्क, सैनिटाइज़र

  • एडमिनिस्ट्रेशन चार्ज

  • कुछ कंज्यूमेबल आइटम्स

ये छोटे-छोटे खर्च मिलकर बड़ा अमाउंट बन जाते हैं, जो पूरी तरह आपको खुद देना पड़ता है।

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4. वेटिंग पीरियड की शर्तें

हर पॉलिसी में कुछ बीमारियों के लिए वेटिंग पीरियड होता है। अगर इस दौरान इलाज की जरूरत पड़ती है, तो इंश्योरेंस कंपनी क्लेम नहीं देती।

जैसे कि पहले से मौजूद बीमारी (Pre-existing condition) के लिए अक्सर 2–4 साल का वेटिंग पीरियड होता है।

5. नेटवर्क हॉस्पिटल का चयन

अगर आप इंश्योरेंस कंपनी के नेटवर्क हॉस्पिटल में इलाज नहीं कराते, तो आपको पहले खुद भुगतान करना पड़ सकता है और बाद में रिइम्बर्समेंट के लिए आवेदन करना होता है।

इस प्रक्रिया में कुछ खर्च कट सकते हैं या देरी हो सकती है, जिससे आपको अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ता है।

6. सब-लिमिट्स और कैपिंग

कुछ पॉलिसी में खास इलाज या सर्जरी पर लिमिट तय होती है। उदाहरण के लिए, मोतियाबिंद सर्जरी के लिए एक निश्चित राशि ही कवर होगी, चाहे असली खर्च ज्यादा क्यों न हो।

यह ‘सब-लिमिट’ क्लॉज अक्सर क्लेम के समय सामने आता है और लोगों को चौंका देता है।

क्या कहती हैं रिपोर्ट्स?

Insurance Regulatory and Development Authority of India की रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में हेल्थ इंश्योरेंस क्लेम के दौरान 10–25% तक खर्च पॉलिसीहोल्डर को खुद उठाना पड़ता है।

यह आंकड़ा इस बात को साफ करता है कि इंश्योरेंस होने का मतलब 100% खर्च कवर होना नहीं है।

विकाश विश्वकर्मा

नमस्कार! मैं विकाश विश्वकर्मा हूँ, एक फ्रीलांस लेखक और ब्लॉगर। मेरी रुचि विभिन्न विषयों पर लिखने में है, जैसे कि प्रौद्योगिकी, यात्रा, और जीवनशैली। मैं अपने पाठकों को आकर्षक और जानकारीपूर्ण सामग्री प्रदान करने का प्रयास करता हूँ। मेरे लेखन में अनुभव और ज्ञान का मिश्रण होता है, जो पाठकों को नई दृष्टि और विचार प्रदान करता है। मुझे उम्मीद है कि मेरी सामग्री आपके लिए उपयोगी और रोचक होगी।
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