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खेत में मवेशी चराने के विवाद में तीन दोषी, कोर्ट ने सुनाई जेल की सजा

By: डिजिटल डेस्क

On: Friday, June 5, 2026 12:50 AM

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सिंगरौली जिला न्यायालय ने खेत में मवेशी चराने को लेकर हुए विवाद और मारपीट के 11 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) मुख्यालय बैढ़न, श्री केशव कुमार की अदालत ने एक ही परिवार के तीन आरोपियों को दोषी करार देते हुए छह-छह माह के सश्रम कारावास और जुर्माने की सजा सुनाई है।

यह फैसला 26 मई 2026 को खुले न्यायालय में सुनाया गया। मामला थाना माड़ा अंतर्गत चौकी बंधौरा क्षेत्र के ग्राम बेतरिया का है, जहां वर्ष 2015 में खेत में मवेशी चराने को लेकर विवाद हिंसक हो गया था।

खेत में गाय चराने से रोकने पर हुआ हमला

अभियोजन के अनुसार, 26 अगस्त 2015 की शाम फरियादी हीरालाल साहू अपने खेत की ओर गए थे। वहां उन्होंने देखा कि गांव के झब्बूलाल साकेत और मुन्ना साकेत उनके अरहर और उड़द के खेत में मवेशी चरा रहे थे। जब हीरालाल ने इसका विरोध किया तो विवाद बढ़ गया।

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शिकायत में कहा गया कि झब्बूलाल साकेत ने लाठी से हमला कर हीरालाल के हाथ और कोहनी पर चोट पहुंचाई, जबकि मुन्ना साकेत ने उन्हें पकड़कर मारपीट की। इसी दौरान कुंजलाल साकेत भी मौके पर पहुंचा और उसने लाठी से हीरालाल के कान के पीछे हमला कर दिया। हमले में बुजुर्ग के हाथ की अल्ना बोन में फ्रैक्चर हो गया था।

मेडिकल रिपोर्ट ने मजबूत किया केस

मामले की सुनवाई के दौरान स्वतंत्र गवाह रामलाल साहू अपने पूर्व बयान से मुकर गए, लेकिन अदालत ने घायल हीरालाल साहू की गवाही को विश्वसनीय माना। अदालत ने कहा कि घायल गवाह का बयान कानून की दृष्टि में विशेष महत्व रखता है।

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डॉ. विमला खेस ने न्यायालय में मेडिकल रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए पुष्टि की कि चोटें कठोर और भौथरे हथियार से लगी थीं तथा एक्स-रे में अल्ना बोन फ्रैक्चर पाया गया। अदालत ने इसे गंभीर चोट की श्रेणी में माना।

जमीन विवाद को कोर्ट ने माना “दुधारी तलवार”

बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि दोनों पक्षों के बीच पुराना जमीनी विवाद था, इसलिए आरोपियों को झूठा फंसाया गया है। हालांकि अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि रंजिश केवल झूठे आरोप का आधार नहीं होती, बल्कि अपराध करने का कारण भी बन सकती है।

हालांकि अदालत ने यह पाया कि सार्वजनिक स्थान पर अश्लील गाली-गलौज और धमकी से जुड़े आरोप पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में सिद्ध नहीं हो सके। इस कारण आरोपियों को IPC की धारा 294 और 506 भाग-2 से बरी कर दिया गया।

तीनों आरोपियों को 6-6 माह की जेल

अदालत ने झब्बू उर्फ बृजमोहन साकेत, मुन्ना साकेत और कुंजलाल साकेत को IPC की धारा 325 सहपठित धारा 34 के तहत दोषी ठहराते हुए छह-छह माह के कठोर कारावास और 2-2 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई।

न्यायालय ने यह भी आदेश दिया कि कुल जुर्माने में से 3 हजार रुपये घायल हीरालाल साहू को प्रतिकर के रूप में दिए जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि बुजुर्ग पीड़ित को आई गंभीर चोटों को देखते हुए आरोपियों को प्रोबेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता।

यह फैसला ग्रामीण क्षेत्रों में छोटी बातों से बढ़ने वाले हिंसक विवादों और न्यायालय में मेडिकल साक्ष्यों की अहम भूमिका को एक बार फिर रेखांकित करता है।

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