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 केस डायरी पेश न करने पर हाई कोर्ट नाराज, DGP mp  को दिए सख्त निर्देश

By: डिजिटल डेस्क

On: Thursday, May 28, 2026 8:55 PM

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मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ ने अग्रिम जमानत याचिकाओं की सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा समय पर केस डायरी पेश न किए जाने पर कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने कहा कि यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है, जिससे न केवल न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है बल्कि आरोपियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पीड़ितों के न्याय में भी अनावश्यक देरी हो रही है।

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि कई मामलों में पुलिस पहली तारीख पर केस डायरी प्रस्तुत नहीं कर रही है। इससे अदालत को बार-बार सुनवाई टालनी पड़ती है और जमानत याचिकाओं पर समय रहते निर्णय नहीं हो पाता। न्यायालय ने इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना।

DGP को दिए गए सख्त निर्देश

माननीय हाई कोर्ट ने मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को निर्देश जारी करते हुए कहा है कि प्रदेश के सभी थानों और जांच अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य किया जाए कि अग्रिम जमानत याचिकाओं से संबंधित केस डायरी पहली ही तारीख पर अदालत में उपलब्ध कराई जाए।

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अदालत ने स्पष्ट किया कि केस डायरी डिजिटल माध्यम या भौतिक रूप से प्रस्तुत की जा सकती है, लेकिन सुनवाई के समय उसका उपलब्ध होना अनिवार्य है। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि किसी मामले में जांच अधिकारी की लापरवाही के कारण केस डायरी समय पर प्रस्तुत नहीं होती है तो संबंधित IO (Investigating Officer) पर व्यक्तिगत हर्जाना लगाया जाएगा।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मामला: कोर्ट

सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अग्रिम जमानत याचिकाएं सीधे तौर पर नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ी होती हैं। ऐसे मामलों में देरी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। अदालत ने कहा कि पुलिस प्रशासन को यह समझना होगा कि केस डायरी केवल औपचारिक दस्तावेज नहीं बल्कि न्यायिक निर्णय का महत्वपूर्ण आधार है।

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प्रदेशभर में दिख सकता है असर

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट के इस सख्त रुख का असर पूरे मध्यप्रदेश की पुलिस व्यवस्था पर दिखाई दे सकता है। इससे जांच अधिकारियों की जवाबदेही बढ़ेगी और जमानत मामलों की सुनवाई अधिक तेज और प्रभावी हो सकेगी।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं के अनुसार, कई बार केस डायरी उपलब्ध न होने के कारण अदालतों को अंतरिम राहत देने या सुनवाई स्थगित करने की स्थिति बनती है, जिससे न्याय प्रक्रिया प्रभावित होती है। हाई कोर्ट का यह आदेश भविष्य में ऐसी स्थितियों को नियंत्रित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

न्यायिक व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने की पहल

हाई कोर्ट की इस टिप्पणी को न्यायिक पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने साफ संकेत दिए हैं कि न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी को अब सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाएगा।फिलहाल प्रदेश पुलिस मुख्यालय की ओर से इस संबंध में सभी जिलों को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाने की तैयारी की जा रही है।

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