जबलपुर: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने उम्र के निर्धारण (Age Determination) से जुड़े कानूनी विवादों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दिशा-निर्देशक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी व्यक्ति की आयु को लेकर विवाद उत्पन्न होता है, तो नगर निगम या स्थानीय निकाय द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र की तुलना में स्कूल रिकॉर्ड और मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट (10वीं की मार्कशीट) को अधिक विश्वसनीय और प्राथमिक माना जाएगा।
क्या था मामला? (बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई)
यह निर्णय चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) की सुनवाई के दौरान दिया। याचिकाकर्ता ने नगर निगम के जन्म प्रमाण पत्र को आधार बनाकर आयु का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने दस्तावेजों की कानूनी पदानुक्रम (Hierarchy) का हवाला देते हुए इस याचिका को खारिज कर दिया।
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फैसले के मुख्य बिंदु: क्यों स्कूल रिकॉर्ड है खास?
अदालत ने अपने आदेश में जेजे एक्ट (Juvenile Justice Act) और संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि आयु निर्धारण के लिए दस्तावेजों की एक निश्चित श्रेणी तय है:
- स्कूल रिकॉर्ड/मैट्रिकुलेशन: कानून की नजर में स्कूल में पहली बार प्रवेश के समय दर्ज की गई जन्मतिथि या बोर्ड परीक्षा का प्रमाण पत्र सबसे पुख्ता सबूत है।
- नगर निगम का रिकॉर्ड: इसे केवल तब प्राथमिकता दी जाती है जब स्कूल रिकॉर्ड उपलब्ध न हों या उनमें स्पष्ट त्रुटि हो।
- मेडिकल जांच: यदि उपरोक्त दोनों दस्तावेज मौजूद न हों, तब मेडिकल बोर्ड द्वारा ‘ऑसिफिकेशन टेस्ट’ (Ossification Test) के आधार पर उम्र तय की जाती है।
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अदालत की टिप्पणी: “पदानुक्रम का पालन अनिवार्य”
चीफ जस्टिस की पीठ ने जोर देकर कहा कि, “कानून के अनुसार आयु निर्धारण के लिए दस्तावेजों का एक निश्चित पदानुक्रम (Hierarchy) है। स्कूल रिकॉर्ड इस सूची में सबसे ऊपर हैं और उनके रहते अन्य दस्तावेजों को निर्णायक नहीं माना जा सकता।”
इस फैसले का व्यापक असर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से उन मामलों में स्पष्टता आएगी जहां आपराधिक मुकदमों (खासकर POCSO एक्ट) या सरकारी नौकरियों में उम्र को लेकर विवाद होता है। अक्सर लोग नगर निगम से बाद में बनवाए गए जन्म प्रमाण पत्र पेश करते हैं, लेकिन अब हाई कोर्ट के इस रुख के बाद 10वीं की मार्कशीट और दाखिल-खारिज (Scholar Register) की भूमिका सबसे अहम हो गई है।
यह फैसला स्पष्ट करता है कि प्रशासनिक रिकॉर्ड की तुलना में शैक्षणिक रिकॉर्ड को अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय माना जाना चाहिए।







