लखनऊ/अयोध्या: पश्चिम बंगाल के कद्दावर नेता और मुख्यमंत्री पद के दावेदार सुवेंदु अधिकारी के निजी सहायक (PA) चंद्रनाथ रथ की हाई-प्रोफाइल हत्या के मामले में एक चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। उत्तर प्रदेश पुलिस की ‘गलत पहचान’ (Mistaken Identity) और गंभीर लापरवाही के कारण इस मामले में एक बिल्कुल निर्दोष व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसे अब केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने क्लीन चिट देते हुए रिहा कर दिया है।
‘रॉन्ग आइडेंटिटी’ का शिकार हुआ फेसबुक रील बनाने वाला युवक
आज तक की रिपोर्ट के मुताबिक, बीते 11 मई को कोलकाता पुलिस और यूपी पुलिस की टीम ने एक संयुक्त अभियान चलाकर अयोध्या से ‘राज सिंह’ नाम के एक युवक को गिरफ्तार किया था। पुलिस का दावा था कि वह इस हत्याकांड का मुख्य शार्पशूटर है। गिरफ्तारी के वक्त यह मामला इतना गरमा गया था कि पकड़े गए युवक के भाजपा (BJP) के बड़े नेताओं के साथ कई तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गईं, जिसके चलते पार्टी को भी भारी राजनीतिक बदनामी और असहजता का सामना करना पड़ा।
‘ग्रेट समर सेल’ के बाद भी समर लुक्स और एथनिक वियर पर 60% तक का बड़ा डिस्काउंट
हालांकि, जब इस मामले की कमान केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने संभाली और कड़ियों को जोड़ना शुरू किया, तो यूपी पुलिस की थ्योरी पूरी तरह फेल साबित हुई। जांच में पता चला कि अयोध्या से पकड़ा गया युवक सिर्फ फेसबुक रील बनाने वाला एक सामान्य व्यक्ति है, जिसका इस अपराध या अपराधियों से कोई दूर-दूर तक नाता नहीं है। गलती का अहसास होने पर सीबीआई ने उसे तत्काल प्रभाव से रिहा कर दिया।
‘कॉकरोच जनता पार्टी’, 4 दिनों में इंस्टाग्राम पर बीजेपी को पछाड़ा
मुजफ्फरनगर के टोल प्लाजा से पकड़ा गया ‘असली’ राज सिंह
सीबीआई ने इस मामले में मुस्तैदी दिखाते हुए तकनीकी इनपुट्स के आधार पर ‘असली’ आरोपी राज सिंह उर्फ राजकुमार को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के छपार टोल प्लाजा से दबोच लिया है। असल में इसी राज सिंह की बक्सर से गिरफ्तार अन्य आरोपियों (विक्की मौर्य और मयंक मिश्रा) से सीधी सांठगांठ थी। मुजफ्फरनगर का रहने वाला यह असली राज सिंह ही हत्या के वक्त पेशेवर शूटरों के इस सिंडिकेट को लीड कर रहा था।
यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर फिर उठे गंभीर सवाल
यह कोई पहली बार नहीं है जब उत्तर प्रदेश पुलिस ‘जल्दबाजी’ या ‘गलत पहचान’ के चलते इस तरह के बड़े विवादों में फंसी हो। इससे पहले भी कई मौकों पर महज नाम की समानता या अधूरे डिजिटल फुटप्रिंट्स के आधार पर निर्दोषों को जेल भेजने के मामले सामने आ चुके हैं।इस बेहद संवेदनशील और राजनीतिक रूप से जुड़े मर्डर केस में बिना पुख्ता तस्दीक किए की गई इस गिरफ्तारी ने न सिर्फ जांच एजेंसियों की साख पर बट्टा लगाया है, बल्कि एक आम नागरिक और उसके परिवार को भी बिना किसी वजह के मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ी है। फिलहाल, असली शूटर की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई अब इस पूरी हत्या की साजिश के पीछे छुपे मुख्य मास्टरमाइंड का पता लगाने में जुटी हुई है।






