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मुस्लिम पक्ष ने कोर्ट में पेश किया 1935 का ‘राजपत्र’, ASI सर्वे की वैधानिकता पर छिड़ी नई बहस

By: डिजिटल डेस्क

On: Thursday, April 30, 2026 12:24 AM

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धार/इंदौर: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला परिसर को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई में एक नया मोड़ आ गया है। बुधवार को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में हुई सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष (मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी) ने एक ऐतिहासिक दस्तावेज पेश कर अपने दावों को पुख्ता करने की कोशिश की है। मुस्लिम पक्ष की ओर से अदालत के समक्ष वर्ष 1935 का एक सरकारी राजपत्र (Gazette) प्रस्तुत किया गया है।

1935 के राजपत्र का हवाला और मुस्लिम पक्ष के दावे

मुस्लिम पक्ष के वकीलों ने दलील दी कि तत्कालीन धार रियासत द्वारा जारी किए गए 1935 के राजपत्र में इस परिसर को आधिकारिक तौर पर ‘मस्जिद’ के रूप में दर्ज किया गया था। उनका कहना है कि ब्रिटिश काल और रियासत काल के रिकॉर्ड्स में इसे ‘मस्जिद कमाल मौला’ के नाम से संबोधित किया गया है।

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इस दस्तावेज के आधार पर मुस्लिम पक्ष ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा किए जा रहे वैज्ञानिक सर्वे की आवश्यकता और उसकी वर्तमान स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका तर्क है कि जब ऐतिहासिक दस्तावेज पहले से ही इसकी स्थिति स्पष्ट कर रहे हैं, तो सर्वे के जरिए इसकी प्रकृति बदलने का प्रयास नहीं किया जाना चाहिए।

ASI सर्वे और वर्तमान स्थिति

उल्लेखनीय है कि हाईकोर्ट के आदेश पर पिछले कई हफ्तों से एएसआई की टीम भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वे कर रही है। अब तक की जांच में परिसर के भीतर और आसपास कई महत्वपूर्ण अवशेष, मूर्तियां और पुरातात्विक संरचनाएं मिली हैं। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह प्राचीन वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर है, जिसे बाद में परिवर्तित किया गया था।

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अब तक के प्रमुख तथ्य:

  • सर्वे की अवधि: हाईकोर्ट ने सर्वे के लिए प्रारंभिक समय सीमा के बाद अतिरिक्त समय भी प्रदान किया है।
  • तकनीक: सर्वे में जीपीआर (GPR) तकनीक और आधुनिक फोटोग्राफी का उपयोग किया जा रहा है।
  • हिंदू पक्ष का तर्क: हिंदू पक्ष का कहना है कि परिसर के खंभों और दीवारों पर मौजूद नक्काशी और संस्कृत श्लोक इसके मंदिर होने के पुख्ता प्रमाण हैं।

हाईकोर्ट का रुख और भविष्य की कार्रवाई

अदालत ने मुस्लिम पक्ष द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई के लिए निर्देश दिए हैं। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि 1935 का राजपत्र एक महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है, लेकिन अंतिम निर्णय एएसआई की फाइनल रिपोर्ट और ऐतिहासिक तथ्यों के तुलनात्मक अध्ययन के बाद ही लिया जाएगा।

फिलहाल, धार में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और प्रशासन ने शांति बनाए रखने की अपील की है। इस विवाद का समाधान न केवल धार बल्कि पूरे देश की धार्मिक और सांस्कृतिक राजनीति के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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