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14 साल बाद हत्या के 8 आरोपी बरी, दोषी पुलिस अधिकारी पर FIR के आदेश

By: डिजिटल डेस्क

On: Friday, May 1, 2026 4:45 PM

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ग्वालियर: मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने न्याय व्यवस्था और पुलिस कार्यप्रणाली को लेकर एक नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने हत्या के एक पुराने मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे 8 व्यक्तियों को ससम्मान बरी कर दिया है। ये सभी लोग पिछले 14 वर्षों से जेल की सलाखों के पीछे अपनी बेगुनाही की जंग लड़ रहे थे।

अदालत की सख्त टिप्पणी: ‘न्याय के साथ हुआ खिलवाड़’

मामले की सुनवाई के दौरान माननीय न्यायाधीश ने पाया कि इन 8 लोगों को फंसाने के लिए तत्कालीन जांच अधिकारी (IO) ने न केवल लापरवाही बरती, बल्कि जानबूझकर ‘मनगढ़ंत सबूत’ (Fabricated Evidence) तैयार किए। कोर्ट ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि एक पुलिस अधिकारी का कर्तव्य सच सामने लाना है, न कि निर्दोषों को जेल भेजना। जांच में पाई गई विसंगतियों और झूठे गवाहों के आधार पर अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलट दिया।

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जांच अधिकारी पर FIR और DGP को निर्देश

हाईकोर्ट ने इस मामले में केवल आरोपियों को बरी ही नहीं किया, बल्कि व्यवस्था को जवाबदेह बनाने के लिए कड़ा कदम उठाया है। अदालत ने मध्यप्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को स्पष्ट आदेश दिए हैं कि दोषी जांच अधिकारी के खिलाफ तत्काल प्राथमिकी (FIR) दर्ज की जाए। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि ऐसे अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच हो ताकि भविष्य में कोई पुलिसकर्मी पद का दुरुपयोग कर किसी का जीवन बर्बाद न कर सके।

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14 साल का लंबा इंतजार और कानूनी आंकड़े

इन 8 परिवारों के लिए यह 14 साल किसी वनवास से कम नहीं थे। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला भारतीय न्याय व्यवस्था में ‘अन्यायपूर्ण सजा’ के खिलाफ एक बड़ा उदाहरण बनेगा।

  • कुल समय: 14 वर्ष जेल में बिताए।
  • आरोपी: 8 व्यक्ति (अब ससम्मान मुक्त)।
  • कोर्ट का आदेश: दोषी अधिकारी पर आपराधिक मुकदमा।

पुलिस की विश्वसनीयता पर उठा सवाल

यह फैसला एक बार फिर पुलिस जांच की विश्वसनीयता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है। जानकारों का कहना है कि अक्सर ‘केस सुलझाने’ के दबाव में पुलिस जल्दबाजी में निर्दोषों को आरोपी बना देती है। हाईकोर्ट के इस हस्तक्षेप से अब पुलिस महकमे में जवाबदेही तय होने की उम्मीद जगी है।

प्रशासन की ओर से अब तक इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन DGP कार्यालय को आदेश की प्रति भेज दी गई है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि दोषी अधिकारी के खिलाफ प्रशासन कितनी जल्दी कार्रवाई सुनिश्चित करता है।

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