वैढ़न (सिंगरौली)। मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिला न्यायालय से एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है, जिसमें अपहरण, अवैध बंधक बनाने और जबरन विवाह के गंभीर आरोपों का सामना कर रहे आरोपी संतोष कुमार उर्फ नगमा यादव को अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए बाइज्जत बरी कर दिया। यह फैसला सत्र न्यायाधीश अतुल कुमार खंडेलवाल की अदालत ने सुनाया।
पुलिस थाना वैढ़न में दर्ज अपराध क्रमांक 913/2025 के तहत आरोपी पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 137(2), 87 और 127(4) के अंतर्गत अपहरण, महिला को विवाह के लिए मजबूर करने और अवैध रूप से बंधक बनाने के आरोप लगाए गए थे। मामले की गंभीरता को देखते हुए अभियोजन ने कठोर सजा की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों को अपर्याप्त माना।
उम्र संबंधी दस्तावेजों में विरोधाभास बना मुख्य कारण
सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष कथित पीड़िता की जन्मतिथि संबंधी दस्तावेजों में गंभीर अंतर पाया गया। स्कूल स्कॉलर रजिस्टर में जन्मतिथि 19 अप्रैल 2008 दर्ज थी, जबकि माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की अंकसूची में 17 सितंबर 2009 अंकित थी। ग्राम पंचायत द्वारा जारी मूल जन्म प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया। इस विरोधाभास के कारण अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।
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डेढ़ महीने तक विरोध न करना बना निर्णायक तथ्य
जिरह के दौरान यह भी सामने आया कि कथित पीड़िता लगभग डेढ़ महीने तक आरोपी के साथ विभिन्न सार्वजनिक स्थानों पर रही और यात्रा करती रही। इस अवधि में उसने किसी भी व्यक्ति से सहायता नहीं मांगी और न ही विरोध दर्ज कराया। अदालत ने इन परिस्थितियों को स्वतंत्र सहमति के संकेत के रूप में देखा।
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अदालत का स्पष्ट संदेश
न्यायालय ने कहा कि केवल आरोपों के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, दोषसिद्धि के लिए संदेह से परे ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक हैं। आदेश के बाद जेल में बंद आरोपी की तत्काल रिहाई के निर्देश दिए गए।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह निर्णय पुलिस और अभियोजन एजेंसियों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि नए BNS कानून के तहत भी जांच की गुणवत्ता और दस्तावेजी साक्ष्य सर्वोपरि रहेंगे।







