सिंगरौली जिला न्यायालय ने पावर प्लांट को बम से उड़ाने की धमकी और कथित राष्ट्र विरोधी नारेबाजी से जुड़े बहुचर्चित मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए मुख्य आरोपी मोहम्मद अख्तर को सभी आरोपों से बाइज्जत बरी कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह असफल रहा और पुलिस विवेचना में गंभीर खामियां सामने आईं।
यह फैसला न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) मुख्यालय बैढ़न, श्री केशव कुमार की अदालत ने 26 मई 2026 को सुनाया। मामला वर्ष 2016 का था, जब डायल-100 कंट्रोल रूम भोपाल में एक धमकी भरा फोन कॉल आया था।
“12 बम फिट हैं, इंडिया को उड़ा देंगे” कहकर मचाई थी दहशत
अभियोजन के अनुसार, 24 सितंबर 2016 की रात करीब 8:10 बजे अज्ञात कॉलर ने फोन पर दावा किया था कि सिंगरौली के पावर प्लांट में 12 बम लगाए गए हैं, जो एक घंटे के भीतर फट जाएंगे। कॉल में कथित रूप से पाकिस्तान समर्थक और भारत विरोधी बातें भी कही गई थीं।
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इस सूचना के बाद सुरक्षा एजेंसियों और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया था। साइबर सेल की जांच में जिस मोबाइल नंबर से कॉल किया गया, वह मोहम्मद अख्तर के नाम पर पंजीकृत बताया गया। बाद में पुलिस ने मोहम्मद अख्तर और विजय कुमार सैनी को गिरफ्तार कर IPC की धारा 153, 153A, 506, 507 और 182 के तहत मामला दर्ज किया था।
ट्रायल के दौरान एक आरोपी की मौत
लंबे चले ट्रायल के दौरान सह-आरोपी विजय कुमार सैनी की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उसके खिलाफ कार्यवाही समाप्त कर दी गई। अदालत में अंतिम सुनवाई केवल मोहम्मद अख्तर के खिलाफ हुई, जिसकी पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता आर. डी. शाह ने की।
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कोर्ट में कमजोर पड़ गई पुलिस की पूरी थ्योरी
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पुलिस जांच में कई गंभीर कमियां थीं। केस के विवेचक महेंद्र पांडेय ने जिरह में स्वीकार किया कि जांच में यह सामने आया था कि धमकी भरा फोन मृतक विजय कुमार सैनी ने किया था, न कि मोहम्मद अख्तर ने।
अदालत ने यह भी नोट किया कि अभियोजन पक्ष घटना से जुड़े मोबाइल नंबर की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) और सिम कार्ड के स्वामित्व से जुड़े तकनीकी दस्तावेज पेश नहीं कर सका। इससे आरोपी और कॉल के बीच सीधा संबंध स्थापित नहीं हो पाया।
मुख्य गवाह ने भी बदला बयान
जिस दुकान पर बैठकर दोनों आरोपियों द्वारा कथित राष्ट्र विरोधी बातचीत करने का दावा किया गया था, उस दुकान के संचालक संजय कुमार शाह ने अदालत में पुलिस की कहानी को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वह आरोपियों को पहचानते तक नहीं और पुलिस ने केवल सादे कागजों पर हस्ताक्षर करवाए थे।
इसके अलावा डायल-100 से जुड़े पुलिसकर्मी भी अदालत में कोई प्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या कंप्यूटर प्रिंट पेश नहीं कर सके।
संदेह का लाभ देकर किया बरी
JMFC श्री केशव कुमार ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि मोहम्मद अख्तर ने धार्मिक वैमनस्य फैलाने, धमकी देने या राष्ट्र विरोधी नारे लगाने जैसा कोई अपराध किया था। परिणामस्वरूप अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से संदेह का लाभ देते हुए पूर्णतः दोषमुक्त कर दिया।
अदालत ने आरोपी के जमानत बंधपत्र समाप्त करने और जब्त मोबाइल उसके वैध स्वामी को लौटाने का भी आदेश दिया है। यह फैसला आपराधिक मामलों में तकनीकी साक्ष्यों और निष्पक्ष विवेचना की अहमियत को रेखांकित करता है।







