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आधार कार्ड नहीं, स्कूल रिकॉर्ड को माना प्राथमिक साक्ष्य आरोपी की जमानत खारिज 

By: डिजिटल डेस्क

On: Thursday, May 28, 2026 9:33 PM

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मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पॉक्सो एक्ट (POCSO) से जुड़े एक गंभीर मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए नाबालिगों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि किसी पीड़िता की उम्र निर्धारित करने के लिए आधार कार्ड या अन्य सामान्य दस्तावेजों की तुलना में स्कूल स्कॉलर रजिस्टर और जन्म प्रमाण पत्र को अधिक विश्वसनीय एवं प्राथमिक साक्ष्य माना जाएगा।

मामले की सुनवाई एक जमानत आवेदन पर हो रही थी, जिसमें आरोपी पर पॉक्सो एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया था। आरोपी पक्ष के अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि आधार कार्ड और कुछ अन्य दस्तावेजों के अनुसार कथित पीड़िता घटना के समय बालिग थी, इसलिए आरोपी को जमानत दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने आधार कार्ड वाली दलील खारिज की

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने आरोपी की इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि कानूनन उम्र निर्धारण के लिए सबसे पहले स्कूल में दर्ज प्रवेश रिकॉर्ड (Scholar Register) और नगर निगम या सक्षम प्राधिकरण द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र को महत्व दिया जाता है।

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ग्वालियर खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न उच्च न्यायालयों के पूर्व फैसलों में भी यह सिद्धांत स्थापित किया जा चुका है कि स्कूल रिकॉर्ड प्राथमिक साक्ष्य माना जाएगा, यदि उसमें कोई स्पष्ट विरोधाभास या हेरफेर न हो।

स्कूल रिकॉर्ड में नाबालिग साबित हुई पीड़िता

अदालत के समक्ष प्रस्तुत स्कूल रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी। इसी आधार पर न्यायालय ने माना कि मामला अत्यंत गंभीर प्रकृति का है और ऐसे मामलों में आरोपी को राहत देने का कोई उचित आधार नहीं बनता।

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पीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि POCSO कानून विशेष रूप से बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा प्रदान करने के उद्देश्य से बनाया गया है। ऐसे मामलों में अदालतों को अत्यधिक सावधानी और संवेदनशीलता के साथ निर्णय लेना होता है।

बढ़ते POCSO मामलों के बीच अहम फैसला

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के हालिया आंकड़ों के अनुसार देशभर में POCSO मामलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। मध्यप्रदेश भी उन राज्यों में शामिल रहा है जहां बच्चों से जुड़े अपराधों के मामलों पर न्यायपालिका और पुलिस प्रशासन विशेष निगरानी बनाए हुए हैं।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ग्वालियर हाई कोर्ट का यह फैसला भविष्य के मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है, खासकर उन मामलों में जहां आरोपी पक्ष उम्र को लेकर विवाद खड़ा करता है।

पीड़ितों की सुरक्षा सर्वोपरि: कोर्ट

अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया कि नाबालिग पीड़ितों से जुड़े मामलों में तकनीकी आधारों पर राहत देने से पहले न्यायालय को पीड़िता की सुरक्षा, अपराध की गंभीरता और सामाजिक प्रभाव को प्राथमिकता देनी होगी। कोर्ट के इस सख्त रुख को बाल सुरक्षा कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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