मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने लिव-इन रिलेशनशिप और शादी के वादे से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा है कि लंबे समय तक आपसी सहमति से बने संबंधों को हर परिस्थिति में बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि शुरुआत से ही धोखा देने की नीयत साबित नहीं होती, तो केवल शादी न हो पाने के आधार पर रेप का मामला स्वतः स्थापित नहीं माना जा सकता।
यह टिप्पणी धारा 64(1) BNS के तहत दर्ज एक मामले में नियमित जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई। मामले में आरोपी युवक और महिला पिछले लगभग चार वर्षों से आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे थे। बाद में पारिवारिक विवाद और परिस्थितियों के चलते दोनों की शादी नहीं हो सकी, जिसके बाद महिला की ओर से बलात्कार का मामला दर्ज कराया गया।
अदालत ने संबंधों की प्रकृति को माना महत्वपूर्ण
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि दोनों वयस्क थे और लंबे समय तक स्वेच्छा से साथ रह रहे थे। न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी है कि क्या आरोपी ने शुरुआत से ही शादी का झूठा वादा करके संबंध बनाए थे या परिस्थितियों के बदलने के कारण बाद में विवाह संभव नहीं हो पाया।
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अदालत ने अपने आदेश में कहा कि हर असफल संबंध को आपराधिक अपराध के रूप में नहीं देखा जा सकता। यदि संबंध सहमति पर आधारित था और दोनों पक्ष लंबे समय तक साथ रहे, तो केवल विवाह न हो पाने से धारा 64(1) के तहत बलात्कार का अपराध स्वतः सिद्ध नहीं हो जाता।
आरोपी को सशर्त जमानत
इंदौर खंडपीठ ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी युवक को सशर्त नियमित जमानत प्रदान कर दी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि आरोपी जांच और न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग करेगा तथा किसी भी प्रकार से साक्ष्यों को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा।
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बदलते सामाजिक ढांचे के बीच महत्वपूर्ण फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति आधारित संबंधों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है। भारत में पिछले कुछ वर्षों में ऐसे मामलों की संख्या बढ़ी है, जहां रिश्ते टूटने के बाद आपराधिक शिकायतें दर्ज कराई जाती हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं से जुड़े अपराधों में “शादी के झूठे वादे” के आधार पर दर्ज मामलों की संख्या में लगातार वृद्धि देखी गई है। हालांकि अदालतें हर मामले में परिस्थितियों और संबंधों की प्रकृति के आधार पर अलग-अलग निर्णय दे रही हैं।
कानून और व्यक्तिगत संबंधों के बीच संतुलन की जरूरत
विशेषज्ञों के अनुसार, अदालत का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि व्यक्तिगत संबंधों और आपराधिक कानून के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। न्यायालयों का उद्देश्य सहमति, नीयत और वास्तविक परिस्थितियों का परीक्षण कर न्याय सुनिश्चित करना है, ताकि कानून का दुरुपयोग भी न हो और पीड़ित पक्ष के अधिकार भी सुरक्षित रहें।







