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Diwali 2025 muhurat for wealth and prosperity rituals-वृषभ लग्न में लक्ष्मी पूजन: दीपावली 2025 का धन-सिद्धि योग

By: डिजिटल डेस्क

On: Tuesday, October 7, 2025 11:04 AM

Diwali 2025 muhurat for wealth and prosperity rituals
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Diwali 2025 muhurat for wealth and prosperity rituals-दीपावली 2025 के लिए लक्ष्मी-गणेश पूजन का श्रेष्ठ काल 20 अक्टूबर, सोमवार की संध्या प्रदोष में माना गया है, जिसमें गृहस्थों के लिए 7:08 PM से 8:18 PM IST का कालखंड विशेष फलदायी बताया गया है। यह समय गृह-समृद्धि, स्थायी वैभव और ऋद्धि-सिद्धि के आकर्षण हेतु आदर्श माना जाता है, क्योंकि संध्योत्तर प्रदोष में दीपदान और लक्ष्मी-आवाहन शीघ्र सिद्धि देता है।

शुद्ध तिथि का निर्णय

इस वर्ष कार्तिक अमावस्या का योग 20 अक्टूबर की भोर 3:44 बजे से आरम्भ होकर 21 अक्टूबर की प्रातः 5:54 बजे तक विस्तृत है। दीपावली का पारायण उस दिन स्वीकार्य होता है जब अमावस्या तिथि प्रदोष में उपलब्ध हो, इसलिए गृह-पूजन के लिए 20 अक्टूबर की ही संध्या का चयन शास्त्रसम्मत सिद्ध होता है।

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प्रदोष और स्थिर लग्न का योग

लक्ष्मी-पूजन प्रदोष में और विशेषतः स्थिर (वृषभ) लग्न में अतिशय फलदायक माना गया है, क्योंकि स्थिर लग्न धन के स्थायित्व का सूचक है। संध्या में उपलब्ध वृषभ-काल और प्रदोष के संयोग से 7:08–8:18 PM का विंडो गृहस्थों के लिए सहज, सात्त्विक और स्थिर फल देने वाला मुहूर्त सिद्ध होता है।

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पूजन-पूर्व शुद्धि-संयोजन

गृह-प्रांगण और वेदी की शुद्धि कर गंगाजल छिड़कें, लाल/पीत वस्त्र से चौकी सजाएँ और स्वस्तिक-अंकन कर कलश-स्थापना हेतु स्थान निश्चित करें। दीपावली की संध्या पूर्व संकल्प लेकर ऋण-मुक्ति, आय-वृद्धि और परिवार-कल्याण का भाव रखकर पूजन सामग्री सुव्यवस्थित रखना शुभ माना गया है।

लक्ष्मी-गणेश आराधना-विधि

प्रथम गणेश-पूजन कर विघ्न-निवारण का आह्वान करें, तत्पश्चात महालक्ष्मी का षोडशोपचार पूजन सम्पन्न करें। कलश में जल, सुपारी, हल्दी और सिक्का स्थापित कर आम-पत्र तथा नारियल से मुख-शोभा दें, फिर कुमकुम-अक्षत-चंदन, धूप-दीप, पुष्प और नैवेद्य समर्पित कर आरती एवं क्षमायाचना के साथ आराधना पूरी करें।

वेदोक्त मन्त्र-साधना

लक्ष्मी-कृपा के लिए श्रीसूक्त का साधनापूर्वक पाठ अत्यंत प्रभावी माना जाता है; दीया घृत का हो, आसन शुद्ध हो और जप में स्पष्ट उच्चारण का विशेष ध्यान रखा जाए। श्री यंत्र या कनक-धारा स्रोत के समक्ष श्रीसूक्त, लक्ष्मी-अष्टकम अथवा कनकधारा स्तोत्र का नित्य जप स्थिर धन-प्रवाह और गृह-श्री को पुष्ट करता है।

कुबेर-आवाहन और समृद्धि-संस्कार

धन-संचय की स्थिरता के लिए लक्ष्मी के साथ कुबेर-आवाहन का विधान गृहस्थ परंपरा में विख्यात है। पूजन के उपरांत दिशाओं में दीपदान, अन्न-दान और कुटुम्ब-सेवा का संकल्प लेने से लक्ष्मी-कृपा का प्रवाह दीर्घकाल तक स्थिर रहता है।

छोपड़ा/लेजर पूजन परंपरा

व्यवसायी समुदाय दीपावली की रात्रि में नए बही-खाते, लेजर या डिजिटल अकाउंट्स पर शुभ-लाभ और स्वस्तिक अंकित कर गणेश-लक्ष्मी के समक्ष आराधना करता है। इसे वित्तीय वर्ष के मंगलारम्भ का सूचक माना गया है, जिससे लेन-देन में बाधाएँ घटती और आय-पथ में शुभ संकेत बढ़ते हैं।

वैकल्पिक काल की व्यवस्था

यदि प्रमुख प्रदोष विंडो में पूजन संभव न हो, तो उसी रात्रि का निषीथ/निशीथा काल वैकल्पिक रूप में मान्य माना गया है। तथापि गृह-पूजन को प्रदोष तथा स्थिर लग्न के संगम में ही प्राथमिकता दी जाए, क्योंकि यही काल धन-स्थैर्य और समृद्धि-संवर्धन का सर्वश्रेष्ठ योग निर्मित करता है।

पंच-पर्व का अनुक्रम

धनतेरस 18 अक्टूबर, छोटी दिवाली 19 अक्टूबर, लक्ष्मी-पूजन 20 अक्टूबर, गोवर्धन 22 अक्टूबर और भाई दूज 23 अक्टूबर के रूप में पर्व-धारा का अनुक्रम इस वर्ष प्रचलित है। अतः धन-साधना का मुख्य अनुष्ठान 20 अक्टूबर की संध्या में केन्द्रित रखते हुए शुद्ध दीपदान, वेदोक्त जप और गृह-सेवा से आलोक-पर्व का सार्थक वरण किया जाए।

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