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सिंगरौली एससी/एसटी कोर्ट का फैसला पारिवारिक रंजिश से शुरू हुआ विवाद, मारपीट में सजा, बाकी आरोपों से राहत

By: डिजिटल डेस्क

On: Thursday, March 26, 2026 8:53 AM

SC ST Special Court Singrauli
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सिंगरौली ज़िले मुख्यालय बैढ़न स्थित विशेष न्यायालय (SC/ST एक्ट) ने वर्ष 2021 में दर्ज एक चर्चित मारपीट और जातिसूचक गाली-गलौज के मामले में अपना महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने पाया कि मामला केवल अचानक हुई मारपीट नहीं, बल्कि पहले से चल रही पारिवारिक कड़वाहट और प्रेम प्रसंग से उपजी आपसी रंजिश का नतीजा था। पति-पत्नी, ससुर-दामाद जैसे रिश्तों में चल रहे दहेज और भरण-पोषण के मुकदमों ने इस विवाद को और जटिल बना दिया था।

एफआईआर से फैसले तक की पूरी समयरेखा

घटना 31 अगस्त 2021 की रात करीब 10 से 10:15 बजे के बीच की है, जब बरगवां थाना क्षेत्र में मारपीट की सूचना पर मामला दर्ज हुआ। अगले ही दिन, 1 सितंबर 2021 को FIR अपराध क्रमांक 451/2021 के रूप में दर्ज की गई और 24 नवंबर 2021 को पुलिस ने चार्जशीट न्यायालय में पेश की। 22 जुलाई 2022 को अदालत ने धारा 294, 323/34, 506 (भाग-2) IPC और SC/ST एक्ट की धाराओं में आरोप तय किए, जबकि लगभग साढ़े तीन साल बाद, 18 मार्च 2026 को अंतिम फैसला सुनाया गया।

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कौन थे आरोपी और कौन था पीड़ित पक्ष

इस केस में आरोपी पक्ष की ओर से सुशीला पनिका, श्रीराम पनिका, बबुआराम पनिका और भगवानदास साहू अदालत के सामने खड़े थे। दूसरी ओर, फरियादी कृष्णाराम पनिका और उनके पिता गुलाब पनिका थे, जिन्होंने मारपीट और जातिसूचक टिप्पणी का आरोप लगाया था। अभियोजन की ओर से एडीपीओ संजीव सिंह ने पक्ष रखा, जबकि बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता आशीष कुमार शर्मा ने आरोपियों का बचाव किया। विवेचना की जिम्मेदारी जांच अधिकारी आर.पी. रावत (अ.सा. 9) के पास थी।

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गवाहों की गवाही से किस पक्ष को मिला सहारा

अभियोजन ने अपनी कहानी को साबित करने के लिए कुल 10 गवाह पेश किए, जिनमें पीड़ित कृष्णाराम और गुलाब पनिका की गवाही अहम रही। दोनों ने आरोपियों द्वारा लाठी से मारपीट किए जाने की बात दोहराई, जिससे अदालत ने चोट पहुँचाने की घटना को विश्वसनीय माना। चिकित्सीय साक्षी डॉ. अरुण कुमार शर्मा ने मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर कहा कि जो चोटें दर्ज हैं, वे किसी सख्त और बोथरे औजार जैसे लाठी से दी जा सकती हैं। उर्मिला और केमला पनिका जैसे चक्षुदर्शी गवाहों ने भी मारपीट की घटना का समर्थन किया, जबकि पंच साक्षी मोतीलाल पनिका ने जप्ती की कार्यवाही की पुष्टि की।

धमकी और गाली-गलौज के आरोप क्यों नहीं टिक पाए

जहां मारपीट के आरोप मजबूत साक्ष्यों के सहारे टिक गए, वहीं धमकी (धारा 506) और सार्वजनिक गाली-गलौज (धारा 294) के बिंदु पर अभियोजन कमजोर पड़ गया। अदालत ने नोट किया कि जान से मारने की धमकी को लेकर गवाहों के बयान आपस में मेल नहीं खाते कहीं “गाड़ देने” तो कहीं “गाड़ी चढ़ा देने” जैसी अलग-अलग बातें सामने आईं। न्यायालय ने माना कि इस असंगति को अभियोजन न तो समझा पाया, न ही दूर कर सका, इसलिए धमकी से वास्तविक संत्रास पैदा होने का कानूनी तत्व सिद्ध नहीं हुआ। इसी तरह, पुलिस यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि मौके पर कौन-सी विशिष्ट गालियां दी गईं, जिनसे सार्वजनिक रूप से उपस्थित लोगों को वास्तविक क्षोभ हुआ हो।

जांच में कमियां और ‘अतिशयोक्ति’ पर अदालत की नजर

फैसले में न्यायालय ने साफ कहा कि जांच के दौरान पुलिस कुछ महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर पर्याप्त साक्ष्य जुटाने में नाकाम रही। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि गवाहों ने मारपीट की घटना के इर्द-गिर्द के कुछ आरोपों में “बढ़ा-चढ़ाकर” बयान दिए, जिन्हें बिना ठोस समर्थन के स्वीकार नहीं किया जा सकता। जांच और अभियोजन दोनों स्तरों पर आई इन खामियों ने गैर-जमानती धाराओं के तहत कठोर सजा की संभावना को कमजोर कर दिया।

आंशिक दोषसिद्धि और ‘न्यायालय उठने तक’ की सजा

सभी साक्ष्यों और गवाहियों का विश्लेषण करने के बाद न्यायालय ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 323/34 (सामूहिक मारपीट) में दोषी पाया। इसके तहत चारों आरोपियों को ‘न्यायालय उठने तक’ की प्रतीकात्मक जेल और 1,000–1,000 रुपये के अर्थदंड से दंडित किया गया। इसके अलावा, आरोपी भगवानदास साहू को SC/ST एक्ट के अंतर्गत अलग से ‘न्यायालय उठने तक’ की सजा और 1,000 रुपये जुर्माना लगाया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि अदालत ने जातिसूचक गाली की शिकायत को पूरी तरह नकारा नहीं, बल्कि सीमित रूप से स्वीकार किया।

‘शत्रुता एक दोधारी तलवार’: अदालत की अहम टिप्पणी

अपने फैसले में न्यायाधीश खालिद मोहतरम अहमद ने एक महत्वपूर्ण बात रेखांकित की कि “शत्रुता एक दोधारी तलवार है” यानी आपसी रंजिश से एक ओर अपराध की प्रेरणा जन्म ले सकती है, तो दूसरी ओर झूठे या बढ़ा-चढ़ाकर लगाए गए आरोपों की संभावना भी बढ़ जाती है। चूंकि आरोपी और पीड़ित पक्ष के बीच पहले से मुकदमेबाजी और तनावपूर्ण रिश्ते थे, अदालत ने कठोर कारावास देने के बजाय आर्थिक दंड और प्रतीकात्मक सजा को न्यायसंगत माना। न्यायालय ने साफ किया कि आपराधिक न्याय प्रणाली में केवल आरोप पर्याप्त नहीं, बल्कि हर धारा के आवश्यक तत्वों को संदेह से परे साबित करना अभियोजन की जिम्मेदारी है।

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