नई दिल्ली/चेन्नई: भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में आज का दिन स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया है। तकनीक और कानून के संगम से एक ऐसी ‘क्रांति’ की शुरुआत हुई है, जिसकी कल्पना कुछ साल पहले तक नामुमकिन थी। भारत के मद्रास हाई कोर्ट ने एक पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर देश के पहले ‘AI-Judge’ सिस्टम (कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित न्यायिक प्रणाली) का ट्रायल शुरू कर दिया है। यह कदम अदालतों में लंबित करोड़ों मामलों के बोझ को कम करने की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है।
क्या है ‘AI-Judge’ और यह कैसे काम करेगा?
यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम विशेष रूप से उन मामलों के लिए डिजाइन किया गया है जो प्रकृति में ‘तथ्यात्मक’ और ‘प्रक्रियात्मक’ (Procedural) होते हैं।
- 30 सेकंड में समाधान: ट्रैफिक चालान, चेक बाउंस (Section 138 NI Act) और छोटे दीवानी मामलों में यह सिस्टम मात्र 30 सेकंड के भीतर दस्तावेजों की जांच कर सकता है।
- दस्तावेजों का विश्लेषण: यह सिस्टम हजारों पन्नों के रिकॉर्ड्स को स्कैन कर उनमें से मुख्य बिंदुओं को सारांशित (Summarize) करता है और प्रासंगिक कानूनों की पहचान करता है।
‘शापित’ गुफा से निकला 500 साल पुराना खजाना, पुरातत्व विभाग हैरान
पायलट प्रोजेक्ट की सफलता और दायरा
जनवरी 2026 में मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस एन. आनंद वेंकटेश ने ‘सुपरलॉ कोर्ट्स’ (Superlaw Courts) नामक एआई टूल के नियंत्रित परीक्षण की अनुमति दी थी।
- ताजा अपडेट: अप्रैल 2026 तक, इस सिस्टम का उपयोग अब छोटे आपराधिक और ट्रैफिक से जुड़े मामलों में ‘ड्राफ्ट ऑर्डर’ तैयार करने के लिए किया जा रहा है।
- सांख्यिकी: नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, भारत में 4 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह एआई ट्रायल सफल रहता है, तो लंबित मामलों की संख्या में 40% तक की कमी आ सकती है।
मॉर्निंग वॉक पर निकले वकील की दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या, बदमाशों की बाइक ने ऐन वक्त पर दिया धोखा
क्या वकील और जज की जगह लेगी मशीनें?
इस खबर ने कानूनी गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की ई-कमिटी और कानूनी विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि एआई कभी भी ‘मानवीय संवेदना’ और ‘विवेक’ का स्थान नहीं ले सकता।
- सीमित भूमिका: फिलहाल एआई का काम केवल दस्तावेजों को व्यवस्थित करना और तथ्यों का मिलान करना है।
- अंतिम निर्णय: अंतिम फैसला हमेशा एक ‘मानव जज’ ही सुनाएगा। एआई केवल जज के ‘रिकॉर्ड असिस्टेंट’ के रूप में काम करेगा।
- पारदर्शिता: एआई द्वारा लिए गए हर तर्क का लॉग (Log) रखा जाएगा ताकि उसे चुनौती दी जा सके।
भविष्य की राह
मद्रास हाई कोर्ट के बाद अब दिल्ली और बॉम्बे हाई कोर्ट भी इस तकनीक को अपनाने की तैयारी में हैं। 2026 के ‘इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट’ में भी इस बात पर जोर दिया गया कि ‘लीगल-टेक’ (LegalTech) के माध्यम से न्याय को सस्ता और सुलभ बनाया जा सकता है।







