मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ ने सिधी-सिंगरौली राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुई दर्दनाक बस दुर्घटना के आरोपी चालक को सशर्त जमानत प्रदान की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत का अर्थ आरोपी को पूर्ण स्वतंत्रता देना नहीं है, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।
यह मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 106(1) के तहत दर्ज किया गया था, जो लापरवाही से मौत से संबंधित अपराधों पर लागू होती है। दुर्घटना में कई यात्रियों के घायल होने और जनहानि की सूचना के बाद मामला गंभीर माना जा रहा था।
हाई कोर्ट ने लगाईं कड़ी शर्तें
सुनवाई के दौरान अदालत ने आरोपी चालक को राहत देते हुए कई महत्वपूर्ण शर्तें लागू कीं। कोर्ट ने आदेश दिया कि ट्रायल पूरा होने तक आरोपी किसी भी प्रकार के भारी वाहन (Heavy Vehicle) का संचालन नहीं करेगा। इसके अलावा उसका ड्राइविंग लाइसेंस अदालत की कस्टडी में जमा रहेगा।
डिजिटल साक्ष्यों की प्रमाणिकता साबित होना जरूरी, आरोपी नियमित जमानत
पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि आरोपी को प्रत्येक महीने स्थानीय पुलिस थाने में उपस्थित होकर अपनी हाजिरी दर्ज करानी होगी। अदालत का मानना था कि ऐसी शर्तें आरोपी की निगरानी बनाए रखने और भविष्य में संभावित लापरवाही रोकने के लिए आवश्यक हैं।
सड़क सुरक्षा पर न्यायालय की चिंता
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने सड़क दुर्घटनाओं की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में न्यायालय सड़क सुरक्षा मामलों में अधिक सख्त रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं, खासकर उन मामलों में जहां भारी वाहन चालकों की लापरवाही से गंभीर हादसे होते हैं।
आधार कार्ड नहीं, स्कूल रिकॉर्ड को माना प्राथमिक साक्ष्य आरोपी की जमानत खारिज
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) और सड़क परिवहन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर वर्ष लाखों सड़क दुर्घटनाएं दर्ज होती हैं, जिनमें बड़ी संख्या में मौतें भारी वाहनों से जुड़े हादसों में होती हैं। मध्यप्रदेश भी सड़क दुर्घटनाओं से प्रभावित प्रमुख राज्यों में शामिल रहा है।
जमानत और जिम्मेदारी के बीच संतुलन
कानूनी जानकारों का मानना है कि हाई कोर्ट का यह आदेश “जमानत के साथ जवाबदेही” की अवधारणा को मजबूत करता है। अदालत ने आरोपी को राहत तो दी, लेकिन साथ ही यह सुनिश्चित किया कि वह दोबारा सड़क पर भारी वाहन न चला सके।
विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में अदालतें अब केवल आरोपी के हिरासत अधिकारों को ही नहीं बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा और सामाजिक प्रभाव को भी ध्यान में रखकर निर्णय दे रही हैं।
ट्रायल के दौरान जारी रहेंगी निगरानी शर्तें
फिलहाल आरोपी चालक को ट्रायल पूरा होने तक सभी शर्तों का पालन करना होगा। यदि वह किसी भी शर्त का उल्लंघन करता है तो अभियोजन पक्ष उसकी जमानत निरस्त करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है।हाई कोर्ट का यह फैसला सड़क सुरक्षा और न्यायिक संतुलन दोनों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।







May 28, 2026