मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ ने वित्तीय धोखाधड़ी और आईटी एक्ट से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल व्हाट्सएप चैट या शुरुआती डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर किसी आरोपी को लंबे समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि डिजिटल साक्ष्यों की वैधानिक प्रमाणिकता सिद्ध होना आवश्यक है, तभी उन्हें निर्णायक आधार माना जा सकता है।
यह टिप्पणी एक नियमित जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें अभियोजन पक्ष ने दावा किया था कि आरोपी के मोबाइल फोन से प्राप्त व्हाट्सएप चैट से अपराध में उसकी संलिप्तता स्पष्ट होती है। सरकारी पक्ष ने अदालत से कहा कि चैट रिकॉर्ड आरोपी और अन्य व्यक्तियों के बीच कथित वित्तीय लेन-देन और साजिश की ओर संकेत करते हैं, इसलिए उसे जमानत नहीं दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने डिजिटल साक्ष्यों पर रखी महत्वपूर्ण शर्त
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने कहा कि भारतीय साक्ष्य व्यवस्था में डिजिटल सामग्री को प्रमाण के रूप में स्वीकार करने के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है। अदालत ने विशेष रूप से भारतीय साक्ष्य विधेयक (BSB, 2023) के उन प्रावधानों का उल्लेख किया जो पूर्ववर्ती भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B से संबंधित रहे हैं।
आधार कार्ड नहीं, स्कूल रिकॉर्ड को माना प्राथमिक साक्ष्य आरोपी की जमानत खारिज
कोर्ट ने कहा कि जब तक इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की प्रमाणिकता विधिसम्मत प्रमाणपत्र और तकनीकी परीक्षणों के माध्यम से स्थापित नहीं हो जाती, तब तक केवल प्रारंभिक स्तर पर मिली चैट को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।
लंबे समय तक हिरासत उचित नहीं: अदालत
पीठ ने यह भी टिप्पणी की कि जमानत का उद्देश्य आरोपी को सजा देना नहीं बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उसकी उपस्थिति सुनिश्चित करना है। यदि जांच पूरी हो चुकी हो, डिजिटल उपकरण जब्त किए जा चुके हों और ट्रायल लंबा चलने की संभावना हो, तो आरोपी को अनिश्चितकाल तक जेल में रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
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अदालत ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आरोपी को सशर्त नियमित जमानत प्रदान कर दी। साथ ही निर्देश दिया कि आरोपी जांच और ट्रायल में सहयोग करेगा तथा किसी भी प्रकार से साक्ष्यों को प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेगा।
डिजिटल अपराध मामलों में बढ़ती कानूनी बहस
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म और मैसेजिंग एप्स के बढ़ते उपयोग के साथ इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार साइबर और वित्तीय धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।
हालांकि कानूनी विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि तकनीकी साक्ष्यों की विश्वसनीयता, डेटा की सुरक्षा और प्रमाणिकता का प्रश्न न्यायालयों के सामने बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा है। जबलपुर हाई कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य के कई मामलों में महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में देखी जा रही है।
न्याय और तकनीक के बीच संतुलन की जरूरत
हाई कोर्ट के इस फैसले ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि डिजिटल युग में भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय के संवैधानिक सिद्धांत सर्वोपरि रहेंगे। अदालत ने यह रेखांकित किया कि तकनीकी साक्ष्यों का महत्व जरूर है, लेकिन बिना वैधानिक पुष्टि के उन्हें किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित करने का एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता।







May 28, 2026