वैढन, सिंगरौली (म.प्र.)-सिंगरौली जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) शिवचरण पटेल की अदालत ने पारिवारिक कलह से उपजे एक आपराधिक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। न्यायालय ने कचनी मोड़, थाना वैढन निवासी एक युवक को अपने ही भाइयों के साथ कथित तौर पर गाली-गलौज और विवाद करने के आरोपों से दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने यह फैसला साक्ष्यों के अभाव और सगे भाइयों के बीच हुए आपसी राजीनामे को प्राथमिकता देते हुए सुनाया।
क्या था मामला?
अभियोजन की कहानी के अनुसार, यह घटना 3 जनवरी, 2026 की रात करीब 9:30 बजे की है। फरियादी राहुल कुमार कश्यप ने थाना वैढन में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसका भाई रवि कुमार कश्यप घर आया और खाना मांगने की बात पर मां-बहन की अश्लील गालियां देते हुए विवाद करने लगा। आरोप था कि रवि ने राहुल और बीच- बचाव करने आए दूसरे भाई राकेश कुमार कश्यप के साथ मारपीट की और उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी।
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अदालती कार्यवाही और ‘राजीनामा’
पुलिस ने आरोपी रवि कुमार कश्यप के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की निम्नलिखित धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था:
- धारा 296: अश्लील शब्द या कृत्य (गाली-गलौज)।
- धारा 115(2): स्वेच्छा से चोट पहुँचाना।
- धारा 351(3): आपराधिक धमकी।
विचारण के दौरान 8 अप्रैल, 2026 को मामले में उस समय नया मोड़ आया जब फरियादी राहुल और घायल राकेश ने अपने भाई (अभियुक्त) के साथ सुलह कर ली। चूंकि धारा 115(2) और 351(3) शमनीय (Compoundable) अपराध हैं, इसलिए राजीनामे के आधार पर रवि को इन आरोपों से तत्काल मुक्त कर दिया गया। हालांकि, धारा 296 (गाली-गलौज) कानूनी तौर पर ‘अशमनीय’ होने के कारण इस पर तकनीकी सुनवाई जारी रही।
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गवाहों के मुकरने से कमजोर हुआ अभियोजन
न्यायालय में गवाही के दौरान अभियोजन पक्ष को उस समय बड़ा झटका लगा जब खुद फरियादी राहुल कश्यप (अ.सा.-1) अपनी ही FIR से पलट गया। उसने कोर्ट में बयान दिया कि “भाइयों के बीच मामूली कहासुनी हुई थी और पुलिस ने न तो उससे पूछताछ की और न ही कोई बयान दर्ज किया।” अन्य गवाहों ने भी अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया, जिससे पुलिस की चार्जशीट कमजोर साबित हुई।
न्यायालय का फैसला: रिश्तों की जीत
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शिवचरण पटेल ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थान पर अश्लील शब्दों के प्रयोग का कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं किया गया। न्यायालय ने माना कि चूंकि तीनों सगे भाई हैं और उन्होंने अपना विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिया है, अतः साक्ष्य के अभाव में रवि कुमार कश्यप को धारा 296 के दोष से भी मुक्त किया जाता है।
अदालती विश्लेषण: अदालत ने इस मामले में रिश्तों की गरिमा को समझते हुए कठोर कानूनी दंड के बजाय पारिवारिक शांति को महत्व दिया। मामले में अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता श्री अमरनाथ पाल ने प्रभावी पैरवी की, जिससे एक टूटते हुए परिवार को कानूनी उलझनों से राहत मिली।







