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पिता ने बेटे-बहू पर दर्ज कराया केस, कोर्ट में बयान बदला तो दोनों बरी

By: डिजिटल डेस्क

On: Thursday, June 4, 2026 10:36 PM

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सिंगरौली जिला न्यायालय से पारिवारिक विवाद और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC) मुख्यालय बैढ़न, श्री केशव कुमार की अदालत ने पिता द्वारा अपने ही बेटे और बहू के खिलाफ दर्ज कराए गए आपराधिक मामले में दोनों आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है।

यह फैसला 27 मई 2026 को खुले न्यायालय में सुनाया गया। मामला थाना नवानगर क्षेत्र का है, जहां फरियादी दीनदयाल कोल ने अपने बेटे सुभाष कोल और बहू सुनीता कोल के खिलाफ मारपीट, गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी देने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी।

ईंट से हमला और धमकी देने का लगाया था आरोप

एफआईआर के अनुसार, 13 जनवरी 2026 की शाम करीब 4 बजे दीनदयाल कोल अपने घर के पास पीपल के पेड़ के नीचे बैठे थे। उसी दौरान उनका बेटा और बहू आपस में विवाद कर रहे थे। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि जब वह बीच-बचाव करने पहुंचे तो बहू ने हाथापाई शुरू कर दी और बेटे सुभाष ने ईंट से उनके सिर पर हमला किया। साथ ही दोनों ने कथित रूप से गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी भी दी।

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इस शिकायत के आधार पर नवानगर थाना पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 296, 115(2), 351(3) और 3(5) के तहत मामला दर्ज कर न्यायालय में चालान पेश किया था।

कोर्ट में बदले पिता के बयान

मामले की सुनवाई के दौरान पूरा घटनाक्रम उस समय बदल गया जब मुख्य गवाह और फरियादी दीनदयाल कोल अपने पहले के आरोपों से मुकर गए। न्यायालय में दिए गए बयान में उन्होंने कहा कि यह केवल मामूली पारिवारिक विवाद था और वह गुस्से में आकर थाने पहुंच गए थे।

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उन्होंने अदालत को बताया कि अब परिवार के बीच समझौता हो चुका है और पुलिस ने उनसे विस्तार से पूछताछ भी नहीं की थी। फरियादी ने यह भी कहा कि उन्होंने पुलिस को वैसा बयान नहीं दिया था जैसा केस डायरी में दर्ज किया गया।

समझौते के बाद कमजोर पड़ा अभियोजन

न्यायालय ने पहले ही चोट और धमकी से जुड़ी धाराओं 115(2) और 351(3) BNS में दोनों पक्षों के बीच हुए समझौते को स्वीकार कर लिया था। अंतिम सुनवाई केवल धारा 296 BNS यानी सार्वजनिक स्थान पर गाली-गलौज और अश्लील व्यवहार से संबंधित आरोप पर हुई।

JMFC श्री केशव कुमार ने अपने फैसले में कहा कि जब मुख्य फरियादी गवाह ने ही गाली-गलौज और सार्वजनिक क्षोभ की बात से इनकार कर दिया, तब अभियोजन के पास आरोप सिद्ध करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य नहीं बचता। अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।

संदेह का लाभ देकर किया दोषमुक्त

अदालत ने सुभाष कोल और सुनीता कोल को धारा 296 BNS के आरोप से भी संदेह का लाभ देते हुए पूर्णतः बरी कर दिया। साथ ही दोनों के जमानत बंधपत्र और प्रतिभूति को भारमुक्त करने का आदेश दिया गया।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला दर्शाता है कि पारिवारिक विवादों में समझौते और मुख्य गवाह के बयान का न्यायिक प्रक्रिया पर कितना महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।

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