इंदौर/जबलपुर: पुलिस कस्टडी में होने वाली हिंसा और मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोकने की दिशा में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और कड़ा रुख अपनाया है। इंदौर पुलिस कमिश्नरेट से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर की एकल पीठ ने स्पष्ट आदेश दिया है कि पुलिस थाने के भीतर किसी भी आरोपी या शिकायतकर्ता को ऐसे स्थान पर नहीं ले जाया जा सकता, जो सीसीटीवी (CCTV) कैमरों की निगरानी में न हो।
‘अदृश्य क्षेत्रों’ में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध
अदालत ने पाया कि अक्सर थानों के कुछ हिस्सों (जैसे स्टोर रूम या पिछले गलियारे) में कैमरे नहीं होते, जिसका फायदा उठाकर हिरासत में मारपीट या अनुचित दबाव बनाने की शिकायतें सामने आती हैं। हाईकोर्ट ने सख्त लहजे में कहा है कि “थाने का हर वह कोना जहाँ किसी व्यक्ति को रखा या ले जाया जा रहा है, वह कैमरे की जद में होना चाहिए।” यदि किसी थाने के किसी विशिष्ट क्षेत्र में कैमरा नहीं है, तो वहां किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित होगा।
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‘बॉडी-वर्न कैमरा’ (Body-worn cameras) अनिवार्य करने पर जोर
सिर्फ थाने के भीतर ही नहीं, बल्कि गिरफ्तारी और छापेमारी के दौरान होने वाली घटनाओं में पारदर्शिता लाने के लिए अदालत ने ‘बॉडी-वर्न कैमरा’ के उपयोग पर विशेष जोर दिया है। न्यायमूर्ति अभ्यंकर ने सुझाव दिया कि ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों को अपनी वर्दी पर कैमरा पहनना चाहिए।
अदालत के निर्देश के मुख्य लाभ:
- हिरासत में हिंसा (Custodial Violence) पर रोक: कैमरों की मौजूदगी से पुलिसिया बर्बरता पर लगाम लगेगी।
- झूठे आरोपों से बचाव: कई बार अपराधी पुलिस पर मारपीट के झूठे आरोप लगाते हैं, रिकॉर्डिंग होने से सच सामने आ सकेगा।
- पारदर्शिता: पुलिस की कार्यप्रणाली में जनता का विश्वास बढ़ेगा।
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डेटा और सांख्यिकी: पारदर्शिता की जरूरत
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत में हिरासत में होने वाली मौतों और प्रताड़ना के मामलों में तकनीकी साक्ष्यों की कमी एक बड़ी बाधा रही है। सुप्रीम कोर्ट ने परमवीर सिंह बनाम बलजीत सिंह मामले में पहले ही देश के सभी थानों में नाइट विजन और ऑडियो रिकॉर्डिंग वाले सीसीटीवी अनिवार्य करने के निर्देश दिए थे। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का ताजा निर्देश इसी पारदर्शिता की कड़ी को और मजबूत करता है।
प्रशासन को अल्टीमेटम
हाईकोर्ट ने इंदौर पुलिस कमिश्नर को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं कि सभी थानों के सीसीटीवी उपकरण चालू हालत में रहें और उनकी रिकॉर्डिंग का पर्याप्त बैकअप सुरक्षित रखा जाए। अदालत ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि किसी मामले में सीसीटीवी फुटेज गायब पाया जाता है या जानबूझकर बंद किया गया मिलता है, तो संबंधित थाना प्रभारी के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश न केवल आरोपियों के अधिकारों की रक्षा करेगा, बल्कि आधुनिक पुलिसिंग की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगा।







